ज्ञान से जानकर उसका आचरण करने का करो प्रयत्न : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

कोबा, गांधीनगर। 01 नवम्बर, 2025

ज्ञान से जानकर उसका आचरण करने का करो प्रयत्न : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आयारो आगम के माध्यम से अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि व्यक्ति अनेक विषयों को जानने वाला हो सकता है। शिक्षा संस्थाओं द्वारा अनेक विषयों का ज्ञान कराने का प्रयास किया जा सकता है। अनेक भाषाओं और विषयों का ज्ञान कराया जाता है। यह भी ज्ञान है, और ज्ञान जो भी है, जहां तक जानने की बात है, वह अपने आप में ठीक है। ज्ञानावरणीय कर्म का जब क्षयोपशम होता है, तब ज्ञान प्राप्त होता है। ज्ञान प्राप्त करने के बाद व्यक्ति किस दिशा में जाता है, वह महत्त्वपूर्ण है। कोई व्यक्ति गलत दिशा जैसे चोरी, डकैती, आतंकवाद आदि में चला जाता है, हिंसा करने लग जाता है तो ये कार्य पाप को बोध कराने वाले हो सकते हैं या पाप से संदर्भित हो सकते हैं। इसलिए मेधावी धर्म को जाने, धर्म को जानकर व्यक्ति आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।
अध्यात्म विद्या, धर्म का ज्ञान कराने वाली विद्या है। धर्म ग्रन्थों में भी धर्म का ज्ञान है। आध्यात्मिक विज्ञान भी एक आवश्यक विद्या है, व्यक्ति को इसका भी ज्ञान करने का प्रयास करना चाहिए। जो व्यक्ति अध्यात्म विद्या को समझता है, वह आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नरक, पुण्य-पाप आदि चीजों को भी जान सकता है। जो व्यक्ति अध्यात्म विद्या को नहीं जानता, जीव-अजीव को नहीं जानता, वह संयम को कैसे जानेगा? जहां आत्मवाद, कर्मवाद, लोकवाद आदि के विषय में बताया जाए, नौ तत्त्वों का ज्ञान कराया जाए — वह अध्यात्म विद्या का क्षेत्र है। इनका ज्ञान कर व्यक्ति आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
साधु की पर्युपासना करने से आध्यात्मिक लाभ मिल सकेगा। साधुओं की उपासना में रहने से अच्छी बातें, धर्म की बातें सुनने का अवसर मिलेगा। साधुओं के तो दर्शन मात्र से भी लाभ होता है और प्रवचन सुनने का अवसर मिलता है। साधु की एक प्रेरणा से ही जीवन में सत्संस्कारों का आरोपण हो सकता है। साधुओं का प्रवचन सुनने से ज्ञान मिलता है, फिर प्रवृत्ति शुरू हो जाती है, संयम और तप होता है, और इस प्रकार करते-करते आत्मा मोक्ष तक पहुंच सकती है।
पुस्तकें पढ़ने से भी ज्ञान हो सकता है, लेकिन साथ में कोई अच्छा गुरु या प्रशिक्षक प्राप्त होने से सारा ज्ञान अच्छी तरह प्राप्त हो सकता है। व्यक्ति को अपने कल्याण के लिए धर्म की बातों को जानने, सुनने व समझने का प्रयास करना चाहिए। फिर ज्ञान के अनुसार जीवन में आचरण का क्रम बन जाए तो जीवन का कल्याण हो सकता है। खाना-पीना, सोना-जागना आदि तो पशु भी करते हैं, व्यक्ति के अंदर धार्मिकता का जो प्रभाव होता है, वही व्यक्ति को विशिष्ट बनाता है। व्यक्ति धर्म के क्षेत्र में उत्कृष्ट स्थान तक जा सकता है। इसलिए व्यक्ति को अपने जीवन में धार्मिकता लाने का प्रयास करना चाहिए। मेधावी धर्म को जाने और अपने जीवन में आचरण में लाने का प्रयास करे तो उसके जीवन का कल्याण हो सकता है। अहिंसा के रास्ते पर चलना, बेईमानी से बचना, धोखाधड़ी नहीं करना, जितना संभव हो सके धार्मिक कार्य कर धर्म के पथ पर चलने का प्रयास करना चाहिए। मंगल प्रवचन के पश्चात् मोटेरा-कोटेश्वर ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी प्रस्तुति दी। आचार्यश्री ने ज्ञानार्थियों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। शीला संचेती ने अपनी कलाकृति आचार्यश्री के समक्ष प्रस्तुत करते हुए अपनी भावाभिव्यक्ति दी।