गुरुवाणी/ केन्द्र
मितभाषी, अल्पभाषी बनने का रहे प्रयास : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आयारो आगम के माध्यम से अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि दुनिया में मधुरभाषी लोग मिल सकते हैं तो कठोरभाषी, कर्कशभाषी लोग भी मिल सकते हैं। बोलना हमारे जीवन की आवश्यकता है। कई जगह मौन करना भी अच्छा हो सकता है, तो कई जगह बोलना लाभदायक होता है। व्यक्ति क्या बोले, क्या न बोले, कब बोले और कब न बोले — यह विवेक रखे तो बोलना बहुत कल्याणकारी हो सकता है।
तीर्थंकर भगवान यदि मौन कर लें और प्रवचन न करें, तो हमें ज्ञान कैसे प्राप्त होगा? एक दृष्टि से देखें तो सिद्ध भगवान सबसे बड़े हैं — उनके कोई कर्म नहीं, शरीर नहीं, वाणी नहीं, मन नहीं — वे एकदम विशुद्ध आत्मा हैं। अर्हतों के चार कर्म लगे हुए हैं, परन्तु नमस्कार महामंत्र में सबसे पहले अर्हतों को नमस्कार किया गया है। इसका कारण यह है कि अर्हतों के द्वारा हमें ज्ञान मिलता है। यदि अर्हत या केवली हमें नहीं बताएँ, तो हम यह भी नहीं जान पाएँगे कि सिद्ध भगवान भी होते हैं। अतः अर्हत भगवान जो प्रवचन करते हैं, वह कितना सार्थक होता है — कितने लोगों को उससे ज्ञान मिल सकता है। शताब्दियों तक उनके ज्ञान की बातें चलती रहती हैं तथा पढ़ने वालों और सुनने वालों को बोध व वैराग्य भी प्राप्त हो सकता है। इसलिए मौन का महत्व है तो बोलने का भी अपना महत्व है। व्यक्ति विवेक के अनुसार मौन भी कर सकता है और वाणी का प्रयोग भी कर सकता है।
व्यक्ति में यह विवेक होना चाहिए कि ऐसा बोलूँ जिससे बोलने से किसी दूसरे को लाभ या सुख मिले। बोलते समय यथासंभव अकटु भाषा बोलनी चाहिए। द्वेष या आक्रोश भावना से कटु वचन नहीं बोलना चाहिए। शास्त्र में कहा गया है कि कई लोग साधुओं को भी कठोर वचन बोल देते हैं। साधु साधनाशील हैं, और यदि कोई द्वेषभाव आ गया हो, तो साधु के सावधान करने पर भी कोई कठोर भाषी व्यक्ति यह कह सकता है — “पहले आप अपना ध्यान दीजिए, दूसरों को बाद में उपदेश दीजिए।” उस समय भी साधु का धर्म है शान्त रहना। यह सहन करना भी साधु के लिए निर्जरा का कारण बन सकता है।
वाणी के द्वारा किसी को कष्ट देने का प्रयास भी किया जा सकता है और किसी को शांति, समाधि, सुख देने का प्रयास भी। वाणी से दो सांत्वना के बोल बोलकर किसी के मन की पीड़ा को दूर किया जा सकता है। धर्मोपदेश देने से कुछ समय में मन की अशांति भी कम हो सकती है। आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष चल रहा है। आचार्य भिक्षु के साहित्य में परस्पर सांसारिक उपकार की बात आती है। एक व्यक्ति दूसरे का सहयोग करता है, तो आवश्यकता होने पर दूसरा भी उसका सहयोग कर सकता है। सहयोग की परंपरा आगे के जन्मों तक भी चल सकती है — यह लौकिक सहयोग है। कोई व्यक्ति आर्तध्यान में है, पापाचरण कर रहा है — उसे उपदेश द्वारा आर्तध्यान से हटाना, पापाचरण से संयम की ओर प्रेरित करना, समता और धार्मिक अध्ययन की प्रेरणा देना — यह लोकोत्तर सहयोग हो सकता है। किसी को अध्यात्म की ओर आगे बढ़ाना, मानसिक दुःख के समय समता का उपदेश देना — यह लोकोत्तर उपकार है।
जीवन में लौकिक सहयोग का अपना महत्व है। धन से समर्थ व्यक्ति किसी जरूरतमंद को रोटी, कपड़ा और मकान संबंधी सहायता देकर उसका सहयोग कर सकता है। संस्थाओं में अनुदान देकर सहभागी बन सकता है। जिससे शरीर का उपकार हो, शरीर को साता मिले — वह लौकिक उपकार है, और जिससे आत्मा का उपकार हो, कल्याण हो — वह लोकोत्तर उपकार है। साधु का मुख्य कार्य लोकोत्तर उपकार करना है। अपना बुरा करने वाले, कष्ट देने वाले का भी कल्याण हो — साधु को ऐसी भावना रखनी चाहिए। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरांत अहमदाबाद चातुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के महामंत्री अरुण बैद तथा कोबा के कॉरपोरेटर योगेशभाई ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने समुपस्थित पटेल समाज के लोगों को शराब से मुक्त रहने की प्रतिज्ञा करवाते हुए मंगल प्रेरणा प्रदान की। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।