निष्पक्षता का करें विकास : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

कोबा, गांधीनगर। 02 नवम्बर, 2025

निष्पक्षता का करें विकास : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, महातपस्वी, शांतिदूत युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आयारो आगम के माध्यम से अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि ओज और सम्यक् दर्शन वाला, पक्षपात रहित मुनि धर्म की व्याख्या करे। किसी भी चीज की प्रस्तुति करनी हो या निर्णय देना हो, उसमें निष्पक्षता का भाव होना चाहिए। व्याख्या करने वाले का दृष्टिकोण सम्यक् हो तो वह निर्णय या व्याख्या अच्छी होने की संभावना बन सकती है। जहां निष्पक्षता नहीं होती और वहां कोई फैसला आए तो वह निर्णय अन्यायपूर्ण अथवा पक्षपातपूर्ण हो सकता है। व्यक्ति के अंदर निष्पक्षता का भाव आ जाए तो बहुत अच्छी बात हो सकती है। जहां निष्पक्षतापूर्ण बोलना कठिन लग रहा हो, वहां मौन रह जाना चाहिए। निष्पक्षता पूर्ण की गई व्याख्या या निर्णय उत्तम कोटि का, गरिमापूर्ण हो सकता है।
दुनिया में न्यायपालिका होती है, जो लोकतंत्र का महत्त्वपूर्ण अंग है। न्यायालय में कोई शिकायत लेकर जाए तो वह भी यथार्थ हो, और न्याय देने वाले भी यथार्थ को जानकर निर्णय दें तो वहां भी न्यायपूर्ण फैसला हो सकता है। हो सकता है कि निर्णय एक पक्ष के अनुकूल और दूसरे पक्ष के प्रतिकूल हो, परन्तु न्याय देने वाले में निष्पक्षता का भाव होना चाहिए। द्वेषवश किसी को बदनाम करने के लिए झूठे आरोप नहीं लगाना चाहिए — यह बहुत बुरी बात होती है। शिकायतकर्ता को भी न्यायालय में झूठ नहीं बोलना चाहिए। वकील को भी सच्चाई का प्रयास रखना चाहिए और न्यायाधीश को निष्पक्ष फैसला देना चाहिए। निष्पक्ष फैसला देने में निर्भीकता और निर्लोभता की भावना होनी चाहिए — यह न्याय देने वाले की दो बड़ी शक्तियाँ होती हैं। न्यायाधीश दोनों पक्षों को अपनी बात प्रस्तुत करने का अवसर दे, और फिर अपनी प्रज्ञा, प्रतिभा, विवेक के अनुसार अपना फैसला दे — वह गरिमामय उद्घोषणा होती है।
शास्त्र में कहा गया है कि साधु भी जब धर्म की व्याख्या करे तो उसे भी निष्पक्ष होना चाहिए। आगम के किसी सूत्र का अर्थ करना हो तो उसमें निष्पक्षता होनी चाहिए। अपनी परंपरा को महिमामंडित करने के लिए सही अर्थ के स्थान पर दूसरा अर्थ नहीं करना चाहिए। अन्य किसी सिद्धांत या व्यक्ति के बारे में बोलना हो तो वहां निष्पक्ष रहना चाहिए। जिन बातों को निष्पक्षतापूर्वक कहने की अनुकूलता न हो, उन बातों को छोड़ देना चाहिए।
परिवार में भी निष्पक्षता रहनी चाहिए। पक्षपातपूर्ण व्यवहार से परिवार में विघटन भी हो सकता है। अतः निर्भीकता और निर्लोभता की भावना से दिया गया फैसला बड़ा पवित्र फैसला हो सकता है।
मंगल प्रवचन के उपरांत आचार्यश्री ने सात दिवस पूर्व दीक्षित हुए मुनि हेषऋषिजी को छेदोपस्थापनीय चारित्र प्रदान करने के लिए आर्षवाणी का मंगल उच्चारण किया और नवदीक्षित को छेदोपस्थापनीय चारित्र में स्थापित किया। आचार्यप्रवर ने फरमाया कि यह चातुर्मास का अंतिम रविवार है। मृगशिरा कृष्णा एकम को प्रेक्षा विश्व भारती से हमें विहार करना है। विहार लगभग साढ़े सात बजे के आस-पास होगा।
तदुपरांत साध्वी प्रमुखाश्रीजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि बहिर्मुखी व्यक्तित्व वाले व्यक्ति का ध्यान बाह्य जगत पर केंद्रित रहता है। वह बाह्य पदार्थों, आडंबर को देखता है और उसका मन इन्हीं में लिप्त रहता है। जो अंतर्मुखी व्यक्तित्व के धनी होते हैं, वे बाह्य वातावरण में रहते हुए भी अपना ध्यान भीतरी जगत में रखते हैं। जो व्यक्ति भीतर की यात्रा करता है, उसका आत्मबल और मनोबल बढ़ता है, तथा उसकी अर्हताओं का विकास होता है। इसके पश्चात अहमदाबाद चातुर्मास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष अरविंद संचेती ने अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ किशोर मंडल, अहमदाबाद ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। आचार्यश्री ने किशोरों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।