गुरुवाणी/ केन्द्र
गलती कर छुपाना सबसे बड़ी मूर्खता : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आयारो आगम के माध्यम से अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि एक व्यक्ति स्वयं अच्छे रास्ते पर नहीं चलता है, यह उसकी पहली मूर्खता, अज्ञानता या मूढ़ता है, बालता है। दूसरे, जो लोग अच्छे रास्ते पर चलते हैं, उनकी वह निंदा करता है, उनके चलने में बाधा पैदा करता है, उनको बुरा मानता है — यह उसकी दूसरी मूर्खता है, बालता है। जैसे कोई साधु साधना को छोड़ देता है — एक संयम रूपी हीरा जो प्राप्त हुआ, पर किसी मोह का उदय हुआ, ऐसे भाव आए और साधुत्व को छोड़ दिया — यह उसकी पहली बालता है। इसके पश्चात् अन्य साधु जो साधना कर रहे हैं, उनकी निंदा करता है, उनको गलत बताता है — यह दूसरी गलती है, बालता है।
इसी बात को दूसरे संदर्भ में लें कि एक व्यक्ति या साधु से कोई प्रमाद हो गया है, गलती हो गई — यह पहली मूर्खता अथवा मूढ़ता है। उस साधु से जब उस प्रमाद के बारे में पूछा गया तो उसने उसे अस्वीकार कर दिया, यह उस साधु की दूसरी गलती है — यह मंदमति की दूसरी बालता है। अतः सभी को दो बातों पर ध्यान देना चाहिए — एक, जो गलती हो गई है उसका दोहराव न हो; दूसरा, पूछे जाने पर झूठ नहीं बोलना चाहिए, गलती को स्वीकार कर लेना चाहिए। सरल मन से गलती का प्रायश्चित ग्रहण करना एक अच्छा मार्ग बन सकता है, मार्ग प्रशस्त हो सकता है। मनुष्य से भूल हो सकती है, परन्तु भूल को परिष्कृत करने का प्रयास करना चाहिए।
अपनी गलती को स्वीकार करने का साहस भी कम लोगों में होता है। कई लोग ऐसे होते हैं जो गलती करके उसे ढकने का प्रयास करते हैं, परंतु ऐसी गलती कभी न कभी सामने आ ही जाती है और उसके साथ कई अन्य गलतियाँ भी सामने आ सकती हैं। अतः साधु हो या गृहस्थ — यदि गलती हो जाए तो दूसरी गलती उसे झूठ बोलकर ढकने की नहीं करनी चाहिए। यदि गलती हो जाए तो प्रायश्चित करके आत्मशोधन का प्रयास करना चाहिए। परम पूज्य गुरुदेव ने आज भी सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों को अपनी जिज्ञासाएँ समाहित करने का अवसर प्रदान किया और जिज्ञासाओं के समाधान प्रस्तुत किए।