गुरुवाणी/ केन्द्र
पुरुषार्थ करें, भाग्य भरोसे न रहें : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि, महातपस्वी युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आयारो आगम के माध्यम से पावन देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि कुछ साधु ऐसे होते हैं जो दृढ़ नहीं होते और संयम जीवन के प्रतिकूल चलने लग जाते हैं। कई साधु अपने साधुत्व को छोड़कर गृहवासी बन जाते हैं। जीवन में कभी-कभी ऐसा मोह का प्रभाव या उदय होता है कि व्यक्ति सन्मार्ग से च्युत होकर गलत मार्ग पर चलने के लिए उद्यत हो जाता है या बहुत अच्छी चीज को छोड़कर सामान्य चीज को लेने का इच्छुक बन जाता है। कोई व्यक्ति चिंतामणि रत्न को फेंककर ऋण लेता है, घर में कल्पवृक्ष लगा हुआ है उसे उखाड़कर उसके स्थान पर धतूरा लगाता है, बढ़िया हाथी को बेचकर गधे खरीदता है — ऐसे सद्बुद्धि-विहीन कार्य यदि कोई व्यक्ति करता है तो यह उसका अभाग्य है।
हमारे जीवन में भाग्य और पुरुषार्थ दोनों का अपना महत्व है। जैन दर्शन में कर्मवाद का सिद्धांत है, जिसके अनुसार पिछले जन्म में किए गए कर्मों का फल आगे भोगना पड़ सकता है। इस प्रकार कर्मवाद भाग्य से जुड़ा हुआ है। कर्म का, भाग्य का जीवन में प्रभाव पड़ सकता है, परन्तु व्यक्ति को सत्पुरुषार्थ करने का प्रयास करना चाहिए। भाग्य भरोसे बैठ जाना और अच्छे कार्य न करना, यह अच्छी बात नहीं है। संस्कृत में कहा गया है कि जो पुरुषार्थी है, लक्ष्मी उसी का वरण करती है। जो व्यक्ति भाग्य को प्रधान मान लेता है और पुरुषार्थ करना अस्वीकार कर देता है, यह छोटे व्यक्ति का चिंतन है।
अतः भाग्य के भरोसे नहीं रहकर पुरुषार्थ करना चाहिए, और पुरुषार्थ करने पर भी सफलता न मिले तो दुःखी नहीं होना चाहिए। तत्काल फल न भी मिले तो जो पुरुषार्थ किया गया है, उसका फल कभी न कभी अवश्य मिलेगा — यह आशा रखनी चाहिए। अच्छे पुरुषार्थ का फल अच्छा और गलत पुरुषार्थ का फल गलत मिल सकेगा। अतीत का पुरुषार्थ आज का भाग्य है, और वर्तमान में किया गया पुरुषार्थ भविष्य का भाग्य बन सकता है। अतः भाग्य की पृष्ठभूमि में पुरुषार्थ होता है।
जैन दर्शन में एक नियतिवाद का सिद्धांत भी है। कुछ नियम ऐसे हैं, जहाँ पुरुषार्थ भी काम नहीं कर सकता, उस फल को प्राप्त नहीं कर सकता। जैसे अभव्य प्राणी वह पुरुषार्थ नहीं कर सकता जो मोक्ष प्राप्ति के लिए अपेक्षित है। अतः व्यक्ति को कभी भी भाग्य भरोसे न रहकर अपना सत्पुरुषार्थ करते रहना चाहिए। शास्त्रों में बताया गया है कि कुछ साधु ऐसे होते हैं जो संयम जीवन को प्रतिकूल बना देते हैं और उनमें कुछ सुविधावाद, कुछ लालसा — जैसे रिद्धि, रस, स्वाद, खाने के प्रति लोलुपता और बाह्य आकर्षणों में उलझ जाते हैं — और सन्यास का सम्यक पालन नहीं कर पाते। अतः साधु को भौतिकता की चकाचौंध में मूढ़ नहीं बनना चाहिए और सन्यास के प्रति मजबूत निष्ठा रखनी चाहिए। सन्यास को भार मान लेने पर सन्यास पालन कठिन हो सकता है।
गृहवास में रहते हुए भी व्यक्ति को सदाचारी रहना चाहिए। जीवन में चोरी, धोखाधड़ी आदि पाप नहीं करने चाहिए और अनावश्यक हिंसा से बचना चाहिए।
सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों को ऐसी प्रेरणा मिले कि सन्यास आए तो बहुत अच्छा है, और न भी आए तो गृहवास में भी निर्मलता, सज्जनता रहे, गलत कार्यों में नहीं जाना चाहिए। विनयशीलता हो और अनुशासित जीवन हो। अहंकार और उद्दंडता नहीं होनी चाहिए। सत्पुरुषार्थ करना — ये अच्छे संस्कार रहें तो आदमी आध्यात्मिक और भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में उन्नति कर सकता है। आध्यात्मिकता के प्रति आस्था होती है तो कई बार भौतिक विकास अपने आप ही हो जाता है। धन जीवन में आए या न आए, पर जीवन प्रशस्त रहे, नैतिक मूल्यों से युक्त रहे। इन शिविरों से जीवन में उत्थान हो सकता है।
सघन साधना शिविर के समापन के संदर्भ में आज शिविरार्थियों द्वारा लेवल 1 और 2 की प्रस्तुति हुई, जिसमें लघु नाटिका के माध्यम से शिविर की गतिविधियों का चित्रण किया गया। सघन साधना शिविर के व्यवस्थापक सुरेश दक ने अपनी अभिव्यक्ति दी। परम पूज्य गुरुदेव ने शिविरार्थियों को मंगल प्रेरणा-पाथेय प्रदान किया। विद्यालय भी बालकों को ज्ञान-संपन्न और शील-संपन्न बनाने के अच्छे माध्यम हैं। बालक सम्यक दृष्टि-संपन्न और सम्यक आचार-संपन्न बनें — विद्या संस्थानों के द्वारा इस दिशा में अच्छा कार्य हो सकता है, यदि वे इसे अपना लक्ष्य बनाकर प्रयास करें। शिक्षा संस्कारयुक्त हो। मंगल प्रवचन में आज विद्या भारती शिक्षा समिति के महामंत्री अविनीश भटनागर गुरुदेव के सान्निध्य में उपस्थित हुए। उन्होंने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। पूज्य गुरुदेव ने मंगल आशीर्वचन प्रदान किया। आरएसएस प्रचारक महेश पतंगी भी उपस्थित हुए। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।