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संस्कृति के उत्थान में साधु संतों का महत्वपूर्ण योगदान
भारतीय संस्कृति के उत्थान में साधु-संतों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जैन धर्म ने अपनी चारित्रिक और आध्यात्मिक परंपराओं से भारतीय संस्कृति को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। इसी जैन संस्कृति के संवर्धन के उद्देश्य से अरिहंत नगर, केशवपुर (हुबली) में मुनि विनीत कुमार जी के सानिध्य में “Experience the Life of a Jain Monk for a Day – आरोहण” का अद्वितीय आयोजन किया गया। मुनि विनीत कुमार जी ने उपस्थित 18 साधकों को साधु-चर्या के बारे में बताते हुए कहा – “महप्पसाया इसिणो हवंति”, अर्थात् ऋषि सदा प्रसन्न रहते हैं। जीवन में परिस्थितियाँ कभी अनुकूल तो कभी प्रतिकूल होती हैं, परंतु जो प्रतिकूलता में धैर्य खो देता है, वह प्रसन्न नहीं रह सकता। जो मन को क्षणिक सुख देने वाले विषयों में लगाता है, वह सदा अशांत रहता है। तृष्णा मनुष्य को कभी चैन नहीं लेने देती; लखपति करोड़पति बनना चाहता है, करोड़पति अरबपति, और अंततः सब कुछ पाने की चाह में शांति खो देता है। मुनिश्री ने कहा कि सत्संग जीवन को प्रभावित करता है—सज्जनों की संगति उन्नति का द्वार खोलती है, जबकि कुसंगति पतन का कारण बनती है। जैसे एक साधारण कीट फूलों के संग रहकर भगवान की मूर्ति तक पहुँच जाता है, वैसे ही सद्गति संग से मनुष्य भी ऊँचाइयाँ
छू सकता है। साधु-संतों की संगति जीवन को वैराग्य, शांति और आनंद से भर देती है। मुनि पुनीत कुमार जी ने जीवन में संयम अपनाने और साधु-चर्या को व्यवहार में लाने के व्यावहारिक उपाय बताए। इस कार्यक्रम में श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथ सभा और तेरापंथ युवक परिषद, हुबली के सक्रिय कार्यकर्ताओं का विशेष योगदान रहा।