धर्म है उत्कृष्ट मंगल

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाश्रमण

धर्म है उत्कृष्ट मंगल

आचार्यश्री-तब आपको विरोध नहीं करना चाहिए। मैं नहीं कहता कि आप लोग चन्दा दें या न दें, स्कूल बनाने में सहयोगी बनें या न बनें, क्योंकि यह मेरा विषय नहीं है। पर किसी प्रकार का मनोमालिन्य नहीं रहना चाहिए। कजोड़ीमलजी को सबसे खमत-खामना कर लेना चाहिए।
कजोड़ीमलजी ने और ग्रामवासियों ने परस्पर विनम्रतापूर्वक क्षमा- याचना की। गांव का सारा विरोध परस्पर सौहार्द और स्नेह में परिवर्तित हो गया।
सत्संग से स्वभाव-परिवर्तन
१८ मार्च १९८५ को परमाराध्य आचार्य प्रवर कूकरखेड़ा पधारे। भूतपूर्व सैनिक बलाई भीखाराम तीन किलोमीटर की दूरी से आचार्यवर का प्रवचन सुनने के लिए उपस्थित हुआ। प्रवचनोपरान्त जब आचार्यवर ने संकल्प-ग्रहण के लिए आहान किया तो अनेक लोग खड़े हुए और शराब-मांस का सेवन न करने के लिए कृतसंकल्प हो गये। बलाई भीखाराम पीछे से आगे आया।
आचार्यवर ने पूछा-क्या छोड़ते हो?
भीखाराम शराब, मांस।
आचार्यश्री-बीड़ी, सिगरेट?
एक जैन भाई– यह बीड़ी नहीं छोड़ पाएगा। शराब छोड़ता है, यही काफी है। आचार्यश्री-तुम ठहरो। आचार्यश्री ने फिर उस सैनिक से पूछा- बीड़ी पीते हो?
भीखाराम– हां महाराज! पीता हूं।
आचार्यश्री– अब छोड़ सकते हो क्या?
भीखाराम– छोड़ क्यों नहीं सकता?
आचार्यश्री– तब छोड़ दो।
भीखाराम– करवा दो संकल्प।
आचार्यश्री– सोच तो लिया है न?
भीखाराम– अच्छी तरह सोच लिया है। आचार्यवर ने संकल्प करवा दिया और कहा-जेब में तो नहीं है?
भीखाराम– जेब में तो है।
आचार्यश्री– अब रखकर क्या करोगे? भीखाराम ने तत्काल जेब से बीड़ियां निकाली और तोड़कर फेंक दी। सारी जनता देखती ही रह गयी स्वभाव-परिवर्तन के इस अद्भुत नजारे को।
दौर्मनस्य की दुर्गति
२२ मार्च १९८५ को आचार्य प्रवर का ज्ञानगढ़ में पदार्पण हुआ। यहां के श्रावक श्री रंगलालजी कोठारी के कुछ वर्षों पूर्व पैरों में कैंसर रोग हो गया था। अनेक उपचार करवाए। पर सारा प्रयास निष्फल सिद्ध हुआ। आखिर श्रावकजी संकल्पबद्ध होकर परम श्रद्धेय गुरुदेव के दर्शन किए। कैंसर का रोग उपशान्त होने लगा। कृतसंकल्प के अनुसार इन्होंने अपना काफी समय आचार्यवर की पर्युपासना में बिताना शुरू कर दिया। कुछ समय के बाद श्रावकजी ने गुरुदेव को उपासना कम कर दी और खेती-बाड़ी आदि कार्य में जुट गए। इनका भरा-पूरा परिवार है। पुत्रों ने खेती आदि न करने के लिए काफी दबाव डाला पर ये सहमत नहीं हुए, ऋण लेकर अपना काम-बटाते रहे। पिछले कुछ वर्षों से पिता और पुत्रों के बीच काफी दौर्मनस्य चला आ रहा था।
रात्रि के समय ये लोग गुरुदेव की सन्निधि में उपस्थित हुए। गुरुदेव ने रंगलालजी को काफी उलाहना दिया। गुरुदेव की अमृत-शिक्षा को शिरोधार्य करते हुए श्रावक रंगलालजी ने जमीन खरीदने, खेती-बाड़ी करने का त्याग कर दिया तथा वर्ष में चार महीने गुरुदेव की सेवा में बिताने का संकल्प लिया। इसी बीच पिता-पुत्रों ने अपने पारस्परिक संघर्ष को भी समाप्त कर दिया।
पश्चिम रात्रि में अर्हत् वंदना का समय था। रंगलालजी सामायिक की मुद्रा में गुरुदेव के समीप आसीन थे। आचार्यवर ने वात्सल्यपूर्ण शब्दों में फरमाया-रंगलालजी ! रात को मैंने काफी कड़ा कहा। खमत-खामणा है। बद्धांजलि होकर वंदन करते हुए रंगलालजी बोले-गुरुदेव ! आप माइत हैं हम तो कषायी हैं। आप हमारे सुधार के लिए फरमाते हैं।