श्रमण महावीर

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

श्रमण महावीर

वनस्पति जीवन की न्यूनतम अनिवार्यता है। मांसाहारी लोग वनस्पति खाते हैं पर शाकाहारी लोग मांस नहीं खाते। मांसाहार वनस्पति की भांति न्यूनतम अनिवार्यता नहीं है। उनके पीछे संकल्प की प्रेरणा है। भगवान् की अहिंसा का पहला सूत्र है-अनिवार्य हिंसा को नहीं छोड़ सको तो संकल्पी हिंसा को अवश्य छोड़ो। इसी सूत्र के आधार पर मांसाहार के प्रतिषेध का स्वर अर्थवान् हो गया।
आज विश्व भर में जो शाकाहार का आन्दोलन चल रहा है, उसका मूल जैन परम्परा में ढूंढा जा सकता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- सभी जातियों में मांसाहार प्रचलित था। वैदिक धर्म में मांसाहार निषिद्ध नहीं था। बौद्ध धर्म के अनुयायी श्रमण-परम्परा में होकर भी मांसाहार करते थे। मांस न खाने का आन्दोलन केवल जैन परम्परा ने चला रखा था। उसका नेतृत्व महावीर कर रहे थे।
महावीर ने निर्ग्रन्थों के लिए मांसाहार का निषेध किया। व्रती श्रावक भी मांस नहीं खाते थे। भगवान् ने नरक में जाने के चार कारण बताए। उनमें एक कारण है मांसाहार। मांसाहार के प्रति महावीर की भावना का यह मूर्त प्रतिबिम्ब है।
महावीर का मांसाहार-विरोधी आन्दोलन धीरे-धीरे बल पकड़ता गया। उससे अनेक धर्म सम्प्रदाय और अनेक जातियां प्रभावित हुई और उन्होंने मांसाहार छोड़ दिया। मांसाहार के निषेध का सबसे प्राचीन प्रमाण जैन साहित्य के अतिरिक्त किसी अन्य साहित्य में है, ऐसा अभी मुझे ज्ञात नहीं।
आहार जीवन का साध्य नहीं है, किन्तु उसकी उपेक्षा की जा सके वैसा साधन भी नहीं है। यह मान्यता की जरूरत नहीं, किन्तु जरूरत की मांग है।
शरीर-शास्त्र की दृष्टि से इस पर सोचा गया है पर इसके दूसरे पहलू बहुत कम छुए गए हैं। यह केवल शरीर पर ही प्रभाव नहीं डालता, इसका प्रभाव मन पर भी होता है। मन अपवित्र रहे तो शरीर की स्थूलता कुछ नहीं करती, केवल पाशविक शक्ति का प्रयोग कर सकती है। उससे सब घबराते हैं।
मन शान्त और पवित्र रहे, उत्तेजनाएं कम हों-यह अनिवार्य अपेक्षा है। इनके लिए आहार का विवेक होना बहुत जरूरी है। अपने स्वार्थ के लिए बिलखते मूक प्राणियों की निर्मम हत्या करना क्रूर कर्म है। मांसाहार इसका बहुत बड़ा निमित्त है।
महावीर ने आहार के समय, मात्रा और योग्य वस्तुओं के विषय में बहुत गहरा विचार किया। रात्रि-भोजन का निषेध उनकी महान् देन है।
भगवान् ने मिताशन पर बहुत बल दिया। मद्य, मांस, मादक पदार्थ विकृति का वर्जन उनकी साधना के अनिवार्य अंग हैं।
8. यज्ञ: समर्थन या रूपान्तरण
हमारे इतिहासकार कहते हैं- महावीर ने यज्ञ का प्रतिवाद किया। मैं इससे सहमत नहीं हूं। मेरा मत है-महावीर ने यज्ञ का समर्थन या रूपान्तरण किया था। अहिंसक यज्ञ का विधान वैदिक साहित्य में भी मिलता है। यदि आप उसे महावीर से पहले का मान लें तो मैं कहूंगा
कि महावीर ने उस यज्ञ का समर्थन किया। और यदि आप उसे महावीर के बाद का मानें तो मैं कहूंगा कि महावीर ने यज्ञ का रूपान्तरण किया-हिंसक यज्ञ के स्थान पर अहिंसक यज्ञ की प्रतिष्ठा की।
महावीर का दृष्टिकोण सर्वग्राही था। उन्होंने सत्य को अनन्त दृष्टियों से देखा। उनके अनेकान्त-कोष में दूसरों की धर्म-पद्धति का आक्षेप करने वाला एक भी शब्द नहीं है। फिर वे यज्ञ का प्रतिवाद
कैसे करते?
उनके सामने प्रतिवाद करने योग्य एक ही वस्तु थी। वह थी हिंसा। हिंसा का उन्होंने सर्वत्र प्रतिवाद किया, भले फिर वह श्रमणों में प्रचलित थी या वैदिकों में। उनकी दृष्टि में श्रमण या वैदिक होने का विशेष अर्थ नहीं था। विशेष अर्थ था अहिंसक या हिंसक होने का। उनके क्षात्र हृदय पर अहिंसा का एकछत्र साम्राज्य था।
उस समय भगवान् के शिष्य अहिंसक यज्ञ का संदेश जनता तक पहुंचा रहे थे। हरिकेश मुनि ने यज्ञवाट में कहा- 'ब्राह्मणों! आपका यज्ञ श्रेष्ठ यज्ञ नहीं है।'
'मुने! आपने यह कैसे कहा कि हमारा यज्ञ श्रेष्ठ नहीं है?'
'जिसमें हिंसा होती है, वह श्रेष्ठ यज्ञ नहीं होता।'
'श्रेष्ठ यज्ञ कैसे हो सकता है, आप बतलाएं, हम जानना चाहते हैं।'