गुरुवाणी/ केन्द्र
भाषा के विवेकपूर्ण उपयोग से हो सकता है अनेकों का कल्याण : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण वर्तमान में मेवाड़ की धरा को पावन बना रहे हैं। प्रातः पूज्य प्रवर अपनी धवल सेना के साथ कांकरोली से प्रस्थान कर तेरापंथ की उद्गम स्थली राजनगर की ओर गतिमान हुए। कांकरोली स्थित प्रज्ञा विहार से गतिमान होकर कुछ दूरी पर अणुविभा के मुख्य केन्द्र स्थल पधारे, जहाँ आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को मंगल आशीर्वचन प्रदान किया। तदुपरान्त तुलसी साधना शिखर पर आचार्यश्री भारमलजी के स्मृति स्थल पर जनता को मंगल पाठ सुनाया। इसके पश्चात् आचार्यश्री राजनगर स्थित बोधि स्थल पधारे। मार्ग में सभी जैन एवं जैनेत्तर समाजजन को मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हुए, दोपहर लगभग बारह बजे के प्रवास स्थल राजनगर स्थित भिक्षु निलयम पहुँचे।
भिक्षु निलयम परिसर में आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित जनता को आर्हत् वांग्मय के माध्यम से पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि हमारे जीवन में शरीर और आत्मा—ये दो तत्त्व हैं। इन दोनों के सिवाय कुछ नहीं है। हालांकि भाषा और मन आदि भी होते हैं। मूलतः आत्मा और पुद्गल का बहुत योग है, और यदि विस्तार में जाएँ तो धर्मास्तिकाय आदि छह द्रव्य भी हमारे जीवन में हैं। जहाँ छह द्रव्य हैं, वहाँ लोक है। इन द्रव्यों को संक्षेप में कहा जाए तो जीव और अजीव—ये दो तत्त्व ही इस लोक में हैं। आचार्यश्री ने कहा कि हमारे जीवन में शरीर और आत्मा—इन दोनों का मिश्रित रूप है। इसी मिश्रित रूप से हमारे जीवन में भाषा, मन, पर्याप्ति, प्राण आदि अनेक स्थितियाँ हैं। भाषा एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार व्यक्त करता है। भाषा न होने से विचारों के संप्रेषण में असुविधा हो सकती है। यदि भाषा का विवेकपूर्ण उपयोग हो तो इसके द्वारा अनेक लोगों का कल्याण किया जा सकता है, समस्याओं का समाधान किया जा सकता है, आध्यात्मिक ज्ञान दिया जा सकता है—यह भाषा का उजला पक्ष है।
भाषा का दूसरा पक्ष अंधेरा भी है—जिससे बोलकर झगड़ा, दूसरों को फँसाना आदि कार्य किए जा सकते हैं। बोलने में तीन बातों का ध्यान रखें तो भाषा का विवेकपूर्ण उपयोग हो सकता है—पहला मित-भाषा, अर्थात् अनावश्यक न बोलें; दूसरा दोषरहित बोलना; और तीसरा विचारपूर्वक बोलना। अतः हमारी भाषा उत्तम रहनी चाहिए।आचार्यश्री ने आगे कहा कि आज हम राजनगर आए हैं। यह क्षेत्र हमारे धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता आचार्यश्री भिक्षु के बोधि स्थल से जुड़ा हुआ है। तेरापंथ के उत्पन्न होने में किसी न किसी रूप में राजनगर का योगदान है। राजनगर की जनता ने प्रतिरोध किया, साधुओं को वंदन करना छोड़ा, तो स्थानकवासी मुनि के रूप में भीखणजी जैसे वैरागी साधु का आगमन हुआ।
कालक्रम की दृष्टि से देखा जाए तो— पहला, राजनगर वह स्थल है जहाँ आचार्य भिक्षु को बोधि प्राप्त हुई। दूसरा, यहाँ बुखार का निमित्त बना जिसने उन्हें आगमों के गहन अध्ययन के लिए प्रेरित किया। तीसरे क्रम में बगड़ी और केलवा आदि स्थल आते हैं। आज ऐसे पावन राजनगर में आगमन हुआ है। आचार्यश्री भिक्षु का जन्म त्रिशताब्दी वर्ष भी चल रहा है। इसी वर्ष राजनगर आना भी एक विशेष संयोग है। यहाँ के श्रावक समाज में उत्तम धर्म-जागरूकता बनी रहे।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने समुपस्थित जनता को उद्बोधित करते हुए एक घटना-प्रसंग के माध्यम से पूज्य प्रवर से निवेदन किया कि विहार आदि के समय अपने स्वास्थ्य का समुचित ध्यान रखते हुए ही यात्रा करें। राजनगर में चातुर्मास करने वाली साध्वी उज्ज्वलरेखाजी ने अपने हृदयोद्गार व्यक्त किए। स्थानीय तेरापंथी सभाध्यक्ष ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। स्थानीय ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने भावपूर्ण प्रस्तुति दी। ज्ञानशाला प्रशिक्षिकाओं ने गीत की प्रस्तुति दी। राजनगर के एसडीएम बृजेश गुप्ता एवं सभापति अशोक टाक ने भी अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमार जी ने किया।