श्रेय और हितकर का समाचरण करने का हो प्रयास : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

कांकरोली। 30 नवम्बर, 2025

श्रेय और हितकर का समाचरण करने का हो प्रयास : आचार्यश्री महाश्रमण

नाथद्वारा में अध्यात्म की गंगा प्रवाहित करने के पश्चात् जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, महातपस्वी युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण अपनी धवल सेना के साथ कांकरोली की ओर गतिमान हुए। लगभग 11 किमी का विहार कर आचार्यश्री कांकरोली स्थित प्रज्ञा विहार में पधारे। प्रज्ञा विहार परिसर में बने विशाल प्रवचन पंडाल में समुपस्थित जनसमूह को पावन संदेश प्रदान करते हुए आचार्य प्रवर ने फरमाया कि आदमी सुनकर कल्याण को जानता है और सुनकर पाप को भी जान लेता है। विशेष बात यह है कि दोनों को जानकर जो श्रेय हो, हितकर हो, उसका समाचरण करने का प्रयास करना चाहिए। मनुष्य के पास पाँच इन्द्रियाँ होती हैं। ये पाँच इन्द्रियाँ ही माध्यम बनकर आदमी को ज्ञान भी कराती हैं और भोग भी कराती हैं। श्रोत्रेन्द्रिय और चक्षुरीन्द्रिय बाहर से ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम माध्यम बनती हैं।
प्रवचन के श्रवण से भी ज्ञान की वृद्धि हो सकती है, किसी के बोलने से भी ज्ञान प्राप्त हो सकता है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षक बोलकर ही ज्ञान प्रदान करते हैं। अच्छी बातों के श्रवण से मानो कान धन्य हो जाते हैं। किसी दुःखी व्यक्ति की व्यथा कोई अच्छा आदमी सुन ले, तो सामने वाले को थोड़ी राहत मिल सकती है। कान में कोई कुण्डल आदि आभूषण धारण करना कान की बाहरी शोभा हो सकती है, परन्तु कान से धर्म, अध्यात्म, शास्त्रों की बातें सुनना कान का धार्मिक-भीतरी आभूषण है। आँखों से भी ज्ञान प्राप्त होता है। अतः आँखों से हमें अच्छी धार्मिक-आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़नी चाहिए, जिससे उत्तम ज्ञान प्राप्त हो सकता है। इस प्रकार श्रोत्र और चक्षु से हमें विविध प्रकार का ज्ञान प्राप्त हो सकता है। आदमी को कानों से सुनकर और आँखों से देखकर अच्छा ज्ञान ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए।
परम पूज्य आचार्यश्री भिक्षु का जन्म त्रिशताब्दी वर्ष चल रहा है। आचार्य भिक्षु के साहित्य को पढ़े तो कितने लोगों का कल्याण हो सकता है। आज कांकरोली पहुँचे हैं, जहाँ हमारे रत्नाधिक मुनि श्री सुरेश कुमार जी स्वामी से चार चातुर्मास बाद मिलना हुआ है। आपकी साधना का अच्छा क्रम बना रहे। यहाँ के लोगों में खूब धार्मिक चेतना बनी रहे। आचार्य प्रवर के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ एक नेतृत्व वाला धर्मसंघ है। इसी कारण सबकी आस्था आचार्य में केन्द्रित रहती है। आचार्य की दृष्टि ही सबके लिए सर्वोपरि होती है। पहले उदयपुर और आज कांकरोली में विशाल जनसमूह की उपस्थिति इसी श्रद्धा और आस्था का परिणाम है। हमारी सबकी यह गहरी श्रद्धा उत्तरोत्तर बढ़ती रहे और प्रत्येक तेरापंथी श्रावक-श्राविका यह संकल्प करे कि हम आचार्य के इंगित की आराधना करेंगे और आचार्य प्रवर के प्रति श्रद्धा के भाव बने रहेंगे।
स्थानीय स्वागताध्यक्ष ललित बाफना और सभा अध्यक्ष विनोद बाफना ने अपनी अभिव्यक्ति दी। चार चातुर्मास के उपरान्त गुरु सन्निधि में पहुंचे मुनि सुरेश कुमारजी ने भी अपने हृदयोद्गार व्यक्त किए। मुनि संबोध कुमारजी 'मेधांश', मुनि कैवल्य कुमारजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। बालक विदांशु धारीवाल ने आचार्यश्री से अठाई तप का प्रत्याख्यान किया। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों की प्रस्तुति हुई। कांकरोली की समस्त तेरापंथी संस्थाओं ने सामूहिक रूप से गीत का संगान किया। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित स्थानीय विधायक दीप्ति किरण माहेश्वरी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी। मुनि संबोध कुमारजी के प्रथम उपन्यास ‘मत्स्यादर’ का लोकार्पण जैन विश्व भारती द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमार जी ने किया।