गुरुवाणी/ केन्द्र
जीवन में रहे मानवीयता, सद्भावना और नैतिकता : आचार्यश्री महाश्रमण
जनता की दशा और दिशा बदलने वाले युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण उदयपुर नगरी में अपना त्रिदिवसीय प्रवास संपन्न कर नाथद्वारा की ओर गतिमान हुए और विहार करते हुए ग्राम बिलोता में ढाबालोजी रेस्टोरेंट परिसर में पधारे। प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन के दौरान परम पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आर्हत वाणी के माध्यम से पावन संबोध प्रदान करते हुए फरमाया कि एक सिद्धांत है ‘आत्मवाद’, अर्थात् आत्मा है। शरीर अलग है और आत्मा अलग है। एक अवधारणा यह भी मिलती है कि जो शरीर है वही आत्मा है और जो आत्मा है वही शरीर है। इसे नास्तिक विचारधारा कहा जा सकता है। प्रश्न उठता है कि मैं कौन हूँ? उत्तर है कि मैं आत्मा हूँ। अभी जीवन है, इस कारण आत्मा और शरीर का योग है। जैन दर्शन का यह सिद्धांत है कि जब तक मोक्ष प्राप्त न हो जाए, तब तक आत्मा एक जन्म के बाद दूसरा जन्म लेती रहती है। प्रश्न हो सकता है कि आत्मा का पुनः पुनः जन्म क्यों होता है? शास्त्र में कहा गया है कि चार कषाय — क्रोध, मान, माया और लोभ — आगे से आगे पुनर्जन्म की जड़ों को सिंचन देते रहते हैं। जब तक मोहनीय कर्म है, तब तक जन्म-मरण का क्रम चलता रहता है। मोहनीय कर्म के क्षय हो जाने के उपरांत भी एक बार तो मृत्यु होती है; उसके पश्चात आत्मा जन्म-मरण से मुक्त हो जाती है। पुनर्जन्म का सिद्धांत अध्यात्म से जुड़ा हुआ है। यदि पुनर्जन्म है और मोक्ष है, तो अध्यात्म जगत और साधु बनने की गहरी उपयोगिता सिद्ध हो जाती है।
कोई यह कहे कि पुनर्जन्म है ही — इसका क्या प्रमाण है? तो यह भी कहा जा सकता है कि पुनर्जन्म नहीं—इसका भी कोई प्रमाण नहीं है। ऐसी स्थिति में हमें पुनर्जन्म और आत्मा को मानकर ही जीवन जीना चाहिए, और जीवन को पाप, धोखाधड़ी आदि से बचाते हुए ईमानदारी और नैतिकता के साथ जीने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में सद्भावना, नैतिकता, अहिंसा और संयम रहे तो वर्तमान जीवन के साथ-साथ बाद का जीवन भी अच्छा बन सकेगा। आचार्य श्री तुलसी ने अणुव्रत का प्रवर्तन किया। अणुव्रती बनने के लिए जैनी होना आवश्यक नहीं है, तेरापंथ धर्मसंघ को मानने की आवश्यकता भी नहीं है। जीवन में मानवीयता, सद्भावना और नैतिकता रहे तो व्यक्ति के जीवन में भी शांति रह सकती है।