आचार्य तुलसी : धर्मक्रान्ति के सूत्रधार

संपादकीय

सम्पादकीय

आचार्य तुलसी : धर्मक्रान्ति के सूत्रधार

भगवतगीता में श्रीकृष्ण ने कहा है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌॥
जब जब भारतवर्ष में धर्म के क्षेत्र में ग्लानि उत्पन्न होती है, तब-तब भारतवर्ष को अधर्म से उबारने के लिए उसके अभ्युदय के लिए मैं किसी न किसी रूप में अवतरित होता हूं। चूंकि जैन धर्म अवतारवार में विश्वास नहीं करता, फिर भी आचार्य तुलसी के सन्दर्भ में देखते हैं तो श्रीकृष्ण द्वारा उच्चारित यह सूत्र चरितार्थ होता दिखाई देता है।
धर्म क्रांति के पुरोधा :
बीसवी सदी के प्रारंभ में आचार्यश्री तुलसी इस धरा पर धर्म क्रान्ति के पुरोधा बनकर अवतरित हुए। वे अध्यात्म के क्षितिज पर भोर का किरण बनकर उतरे। धूप की भांति खिले और प्रचंड सूर्य की भांति खिले। अध्यात्म जगत में फैली हुई अनैतिकता, असंयम और दृढ़िवाद की तिमिरता को उजाले से भर दिया। उन्होंने अधर्म के अंधियारे को चीरते हुए धर्म का तेजोमय सही स्वरूप प्रस्तुत करते हुए अभिनव क्रान्ति का शंखनाद किया।
धर्मक्रान्ति के सूत्रधार आचार्य श्री तुलसी के साथ भी प्रारंभ में वही घटित हुआ जो क्रान्ति के हर सूत्रधार के साथ होता है। जैसे कि मार्टिन ल्यूथर, ईसा मसीह, सुकरात, महात्मा गांधी, आचार्य भिक्षु आदि। आचार्य तुलसी की धर्म-क्रान्ति के सामने अनेक आरोह-अवरोह आए। उनका भयंकर विरोध हुआ, उन्हें जान से मारने का प्रयास हुआ। आगजनी की घटनाएं हुई, कोर्ट केस किए गए, लेकिन क्रान्ति की लहर कब रुकी है? उनके सामने आने वाले मुसीबतों के पहाड़ स्वयं धराशायी हो गए। अवरोधों की आंधियां स्वतः शांत हो गई। कठिनाइयां चकनाचूर हो गई।
लहर को पता है वह टकराएगी, टकराकर मिट जाएगी।
फिर भी वह झूम के चलती है, तूफान को चूम के चलती है।।
धीरे-धीरे लोग आचार्य श्री तुलसी के उद्देश्यों को, उनकी भावनाओं को समझने लगे। विरोध का झंडा लेकर चलने वाले चरणों में झुकने लग गए।
संप्रदाय विहिन धर्म के प्रवर्तक :
आचार्य श्री तुलसी ने देखा कि समाज और राष्ट्र में धर्म के संदर्भ में गलत अवधारणाएं बनी हुई है। एक तरफ धर्म को मंदिर, मस्जिद या गिरजाघरों की चार दीवारों में कैद कर लिया गया है, उसे क्रियाकांड की वस्तु मान लिया गया है। आदमी सोचता है कि धर्म स्थान में पूजा-पाठ कर लो। बाहर कितने भी अनैतिक काम कर लो उसमें कोई दोष नहीं है। धर्म स्थान में जाकर धूप-दीप कर लो, आरती उतार लोए, सब पाप कर्म नष्ट हो जाएंगे। दूसरी तरफ सम्प्रदाय को धर्म मान लिया गया। आचार्य तुलसी एक संप्रदाय के आचार्य थे लेकिन उनका चिंतन अपने संप्रदाय तक सीमित नहीं था। उनका मानना था धर्म बहुत व्यापक है। धर्म सार्वभौम तत्व है और उसे किसी एक सम्प्रदाय के कठघरे में कैद नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा- मैं संप्रदाय का विरोधी नहीं हूं। लेकिन धर्म को प्रथम स्थान देना है। सम्प्रदाय असत्य हो सकते हैं धर्म कभी असत्य नहीं हो सकता।
सूर्य का प्रकाश सबको समान रूप से मिलता है उस पर किसी व्यक्ति विशेष का अधिकार नहीं हो सकता। वैसे ही धर्म भी सबके लिए समान होता है। उस पर किसी संप्रदाय विशेष का अधिकार नहीं है। उन्होंने फरमाया- ‘आत्म शुध्दि का जहां प्रश्न है, संप्रदाय का मोह न हो’ धर्म आत्मशुध्दि का साधन है उसमें संप्रदाय का मोह नहीं होना चाहिए। जहां धर्म गौण और सम्प्रदाय प्रमुख हो जाता है वहां सांम्प्रदायिक अभिनिवेश उत्पन्न होता है। तनाव और हिंसा का उद्‌भव हो जाता है। उस समय अपने आप पर सम्प्रदाय विशेष का लेबल लगा देने वाले धर्मनेता लाचार हो जाते हैं। भीष्म पितामह की भांति वे धर्म रूपी द्रौपदी का चीरहरण होते हुए देखते रहते हैं।
1947 में भारत देश आज़ाद हुआ और साम्प्रदायिक अभिनिवेश की आग की लपटों में अनेक निर्दोष हिन्दु-मुस्लिम नागरिकों का कत्लेआम हो गया। उन दृश्यों से भारतमाता का कलेजा भी शायद कांप उठा। इस स्थिति से व्यथित आचार्य श्री तुलसी ने देश को उबारने का एवं हिंसा की हुवाशनी से बचाने का बीड़ा उठाया। उन्होंने कहा- 'इन्सान पहले इन्सान, फिर हिन्दु या मुसलमान' और इस सूत्र को चरितार्थ करते हुए उन्होंने 1 मार्च 1949 को 'अणुव्रत आंदोलन' का सूत्रपात कर दिया। देश के मूर्धन्य विद्वानों ने एवं शीर्षस्थ राजनेताओं ने उसका स्वागत किया। कुछ ही समय में यह आंदोलन सम्प्रदाय विहिन धर्म के रूप में प्रतिष्ठित हो गया। गुरुदेव तुलसी ने अणुव्रत गीत में कहा है-
अपने से अपना अनुशासन, अणुव्रत की परिभाषा।
वर्ण जाति या सम्प्रदाय से, मुक्त धर्म की भाषा।।
यह सम्प्रदाय मुक्त धर्म की स्थापना सारे विश्व के लिए शांति का संदेश बन गई।
नैतिकता परमो धर्म :
‘अहिंसा परमो धर्म’ - यह भारतीय संस्कृति का महान सूत्र रहा है। आचार्य श्री तुलसी ने कहा- अहिंसा हमारा साध्य है। उसका साधन है नैतिकता और अपरिग्रह। असाध्य शुध्द है लेकिन उसकी प्राप्ति के साधन भी शुध्द होने चाहिए। जहां परिग्रह है, अनैतिकता है, बेईमानी है, धोखाधड़ी है वहां अहिंसा का अस्तित्व सुरक्षित नहीं रह सकता। उन्होंने कहा- अनैतिकता की चिलचिलाती धूप से बचना है तो अणुव्रत एक मात्र छत्री है।
भगवान महावीर ने कहा- 'णाणस्स सारं आयारो'
ज्ञान का सार आधार है। आचरण के बिना प्राप्त किए गए ज्ञान का कोई मूल्य नहीं है। व्यक्ति धर्म स्थान में जाता है, पूजा-पाठ करता है और बाहर आकर दूसरों से धोखा करता है, शोषण करता है, हिंसात्मक उपद्रव करता है, मिलावट करता है। व्यापार व्यवसाय में बेईमानी करता है, दिखाता कुछ है- देता कुछ है, अपने स्वार्थ के लिए वोट को बेंचता है खरीदता है। यह तो सरासर अन्याय और अनैतिकता है। जहां ऐसी अनैतिकता है वहां धर्म ठहर नहीं सकता।
'संयमः खलु जीवनम्'
आचार्य श्री तुलसी ने जिस अणुवत धर्म का प्रतिपादन किया। उसका प्रतीक-सूत्र है- 'संयम: खलु जीवनम् - संयम ही जीवन है' यह सूत्र आज अणुव्रत की पहचान बन गया है। आचार्य श्री ने अनुभव किया कि वर्तमान की हिंसा, आतंकवाद, गरीबी, शोषण, बेरोजगारी, दहेज जैसी भयंकर रूढ़ियां, पर्यावरणीय प्रदूषण, अपराध, मांसाहार, व्यसन, फैशन आदि जितनी - जितनी समस्याएं हैं उनकी उद्‌मय भूमि है मनुष्य का असंयम। जब तक मनुष्य की दिनचर्या में रहन-सहन में संयम का आचरण नहीं होगा तब तक ये सभी समस्याएं समाहित होने वाली नहीं है। अतः उन्होंने अणुवत आचार संहिता में संयम को महत्वपूर्ण स्थान दिया। अणुव्रत के प्रत्येक नियम में संयम की भावना दृष्टिगोचर हो रही है। चलने में फिरने में उठने-बैठने में, वाणी में आहार में संयम आ गया तो शरीर भी स्वस्थ रहेगा, मन भी स्वस्थ रहेगा, व्यक्ति, समाज और राष्ट्र भी स्वस्थ रहेगा। पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा और विश्व बंधुत्व एवं विश्व शांति का सपना साकार होगा। व्यक्ति बदलेगा और व्यक्ति बदलेगा तो आज जाकर पूरा राष्ट्र और विश्व बदलेगा।
हवा का झोंका आते ही, पक्षों का हिलना निश्चित है।
अग्नि का स्पर्श होते ही, कागज का जलना निश्चित है।।
कहते हैं गुरुवर तुलसी, इसी प्रकार मान के चलो- अणुव्रत का आचरण होते ही, आदमी का बदलना निश्चित है।।
मानवता के ऐसे महान पुरस्कर्ता जन-जन के उद्धारक, महान धर्मनायक , समाज सुधारक और राष्ट्रनायक विश्व संत आचार्य श्री तुलसी की दीक्षा के शताब्दी वर्ष की संपन्नता पर मैं उनकी पावन स्मृति को वंदन करता हूं। उनके पवित्र जीवन से हम भी प्रेरणा लेते हुए अणुव्रती बनने का लक्ष्य रखते हुए अणुव्रत पथ पर दृढ़ता से चरण न्यास अवश्य करें यही मंगलकामना ।
गुरुवर तुलसी की दीक्षा शताब्दी यही संदेश दे रही है कि अगली शताब्दी आचार्य तुलसी के अवदानों की शताब्दी होगी। हिंसा, युध्द, असंयम, नशे और पर्यावरणीय प्रदूषण की विभिषिकाओ से मुक्त होकर सुख, शांति और आनंदपूर्ण जीवन जीने के लिए जगत के पास एक ही रास्ता है - आचार्य श्री तुलसी का दर्शन। नि:संदेह उनके अवदान - अणुव्रत, प्रेक्षाध्यान, और जीवन विज्ञान पूरे जगत के लिए वरदान बन सकते हैं।
पुनः तीर्थकर तुल्य उस महान् आत्मा को कोटिश: वंदन। उनके महान उत्तराधिकारी प्रेक्षा प्रणेता आचार्यश्री महाप्रज्ञजी एवं वर्तमान अणुव्रत अनुशास्ता विश्व संत आचार्यश्री महाश्रमणजी के चरणों में कृतज्ञ भाव से नमन ।