स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
वस्तुतः जाति से कोई गंवार नहीं होता। मनुष्य अपनी नासमझी के कारण ही गंवार कहलाता है।
धराहरा जिण केवली
करेडा- १४-६-८५
परमाराध्य आचार्य प्रवर के सान्निध्य में भगवती व्याख्याप्रज्ञप्ति सूत्र का वाचन चल रहा था। विद्यार्थी एवं सूत्र-रसपिपासु साधु-साध्वियों का समुदाय सम्मुखीन था। जिज्ञासु समणीगण भी वहीं थीं। उसमें एक पाठ आया - 'उप्पण्णणाणदंसण धरा अरहा जिणा केवली'। इस पाठ को सुनकर श्रद्धास्पद आचार्यवर ने फरमाया-जब-जब मैं इस पाठ को सुनता हूं, एक सरस संस्मरण मेरी स्मृतिसृति पर अवतरित हो जाता है— लाडनूं नगरवासिनी महिला मोहनलाल खटेड़ की मौसी सास /श्वशुर चुन्नीलाल जी की धर्म पत्नी एक तत्त्वज्ञ श्राविका थी। उसे अनेक थोकड़े कण्ठस्थ थे। एक बार वह मेरे पास आई और प्रश्न उपस्थित करते हुए बोली- गुरुदेव ! थोकड़ों में एक जगह आता है-'धराहरा जिण केवली। इसका तात्पर्य क्या है?
वस्तुतः पाठ उप्पण्णणाणदंसण धरा अरहा जिणा केवली' था पर भाषाशास्त्रीय अल्पज्ञता के कारण उस वयोवृद्धा ने उप्पण्णणाणदंसण को एक तरफ कर दिया। 'अरहा' को 'हरा' बना दिया और उस बहिन का अपना मुंहजमा पाठ बन गया– 'धरा हरा जिण केवली!
मैंने अनेक व्यक्तियों के समक्ष इस प्रश्न को उपस्थित किया, पर कोई भी इसका अर्थ स्पष्ट करने में समर्थ नहीं हुआ। अन्ततोगत्वा मैंने भगवती सूत्र पर दृष्टिपात किया। फलस्वरूप पता चला कि प्रश्न-कारिका बहिन अपूर्ण और अशुद्ध पाठ बोल रही है। पूर्ण और शुद्ध पाठ- उप्पण्णणाणदंसण धरा अरहा जिणा केवली है जिसका अर्थ है-उत्पन्न ज्ञान-दर्शन के धारक अरिहन्त जिन (जेता या ज्ञानी) और केवली।
कभी-कभी अनभिज्ञता और अजागरूकता के कारण सरल तथ्य भी अबूझ पहेली का रूप धारण कर लेते हैं।
शिक्षा-द्वयी
परमाराध्य आचार्य प्रवर आसीन्द नगर में विराजमान थे। ब्रह्ममुहूर्त का समय था। सभी संत आचार्यवर के समीप आसीन थे। आज रात्रि में मच्छरों का साम्राज्य था। जिससे आचार्यप्रवर बहुत कम नींद ले पाए। इसी बात का जिक्र करते हुए गुरुवर ने कहा- आज रात को तो वह आगम-वाणी बहुत याद आ रही थी-
पुट्टो य दंसमसएहिं, समरेव महामुणी।
नागो संगाम सीसे वा, सूरो अभिहणे परं ।।
गुरुदेव ने संतों से पूछा कि यह 'समरेव' क्या है? अनेक संतों ने यही उत्तर दिया कि समर यानी युद्ध।
आचार्य प्रवर ने कहा- युद्ध अर्थ का द्योतक शब्द 'संगाम सीस' आगे आया है फिर यहां 'युद्ध' अर्थ कैसे होगा? अन्ततोगत्वा शब्द को शल्य-चिकित्सा करते हुए गुरुदेव ने कहा- यहां 'सम एव' शब्द है अर्थात् समभाव में रहे। रकार का आगम होने से समरेव बन गया है।
इस पूरी गाथा का अर्थ इस प्रकार है- डांस और मच्छरों का उपद्रव होने पर महामुनि समभाव में रहे, क्रोध आदि का वैसे ही दमन करे, जैसे युद्ध के अग्रभाग में स्थित हाथी बाणों को नहीं गिनता हुआ शत्रुओं का हनन करता है।
आचार्यवर ने इस गाथा के माध्यम से भाषा-शास्त्र और परीषह- विजय दोनों के बारे में संत-मण्डली को शिक्षा प्रदान की।
उपहार
'बेमाली' नामक एक छोटा-सा कस्बा, जहां पर परमाराध्य आचार्यवर ससंघ विराजमान थे। एक ग्रामीण भाई, जिसके शरीर पर वार्धक्य के लक्षण परिलक्षित हो रहे थे, आचार्य प्रवर के समीप आया और करबद्ध होकर बोला – 'महाराज! आज से बाईस वर्ष पूर्व आपश्री का यहां आगमन हुआ था। उस समय एक उपहार मैंने श्रीचरणों में भेंट किया था। वह उपहार एक संकल्प का था कि मैं आजन्म मृत्यु-भोज में भोजन नहीं करूंगा। आज पुनः आपश्री के चरण मेरे गांव में टिके हैं। इस शुभ अवसर पर मैं एक उपहार और आपको भेंट करना चाहता हूं, जिसे स्वीकार कर मुझे कृतार्थ करें- जीवन पर्यन्त में (बीड़ी) धूम्रपान नहीं करूंगा।' इसी भांति महाजन लोग मिलावट आदि न करने के लिए कृतसंकल्प होते, अन्य जन मदिरापान आदि का परित्याग करते। कुछ लोग ब्याज की मात्रा को सीमित करते।