स्वाध्याय
श्रमण महावीर
उचित अवसर देख मृगावती बोली- 'भंते! मैं आपकी वाणी से बहुत प्रभावित हुई। महाराज चण्डप्रद्योत मुझे स्वीकृति दें और वत्स के राजकुमार उदयन की सुरक्षा का दायित्व अपने कंधों पर लें तो मैं साध्वी होना चाहती हूं।'
चण्डप्रद्योत का सिर नत और मन प्रणत हो गया। अहिंसा के आलोक में वासना का अंधतमस् विलीन हो गया। उसने उदयन का भाग्यसूत्र अपने हाथ में लेना स्वीकार कर लिया, आक्रामक संरक्षक बन गया। मृगावती को साध्वी बनने की स्वीकृति मिल गई। कौशांबी की जनता हर्ष से झूम उठी। युद्ध के बादल फट गए। मृगावती का शील सुरक्षित रह गया। उज्जयिनी और वत्स दोनों मैत्री के सघन सूत्र में बंध गए।
भगवान् मैत्री के महान् प्रवर्तक थे। उन्होंने जन-जन को मैत्री का पवित्र पाठ पढ़ाया। उनका मैत्री-सूत्र है-
'मैं सबकी भूलों को सह लेता हूं,
वे सब मेरी भूलों को सह लें।
सबके साथ मेरी मैत्री है,
किसी के साथ मेरा वैर नहीं है।'
इस सूत्र ने हजारो-हजारों मनुष्यों की आक्रामक वृति को प्रेम में बदला और शक्ति के दीवट पर क्षमा के दीप जलाए ।
सामाजिक जीवन में भिन्न-भिन्न रुचि, विचार और संस्कार के लोग होते हैं।
भिन्नता के प्रति कटुता उत्पन्न हो जाती है। द्वेष की ग्रन्थि घुलने लगती है। वही समय पर आक्रामक बन जाती है।
भगवान् ने इस ग्रंथि-मोक्ष के तीन पर्व निश्चित किए-
१. पाक्षिक आत्मालोचन ।
२. चातुर्मासिक आत्मालोचन ।
३. सांवत्सरिक आत्मालोचन ।
किसी व्यक्ति के प्रति मन में वैर का भाव निर्मित हो तो उसे तत्काल धो डाले, जिससे वह ग्रंथि का रूप न ले। भगवान् ने साधुओं को निर्देश दिया- 'परस्पर कोई कटुता उत्पन्न हो तो भोजन करने से पहले-पहले उसे समाप्त कर दो।' एक बार एक मुनि भगवान् के पास आकर बोला- 'भंते। आज एक मुनि से मेरा कलह हो गया। मुझे उसका अनुताप है। अब मैं क्या करूं?'
भगवान् - 'परस्पर क्षमा-याचना कर लो।'
मुनि- 'भंते ! मेरा अनुमान है कि वह मुझे क्षमा नहीं करेगा।'
भगवान् - 'वह तुम्हें क्षमा करे या न करे, आदर दे या न दे, तुम्हारे जाने पर उठे या न उठे, वंदना करे या न करे, साथ में खाए या न खाए, साथ में रहे या न रहे, कलह को शान्त करे या न करे, फिर भी तुम उसे क्षमा करो।'
मुनि- 'भंते ! मुझे अकेले को ही ऐसा क्यों करना चाहिए?'
भगवान् - 'श्रमण होने का अर्थ है शान्ति। श्रमण होने का अर्थ है मैत्री। तुम श्रमण होने का अनुभव कर रहे हो, इसलिए मैं कहता हूं कि तुम अपनी मैत्री को जगाओ। जो मैत्री को जागृत करता है, वह श्रमण होता है। जो मैत्री को जागृत नहीं करता, वह श्रमण नहीं होता।'
इस जगत् में सब लोग श्रमण नहीं होते। श्रमण भी सब समान वृत्ति के नहीं होते। इस वस्तु-स्थिति को ध्यान में रखकर भगवान् ने कहा-यदि तत्काल मैत्री की अनुभूति न कर सको तो पक्ष के अंतिम दिन में अवश्य उसका अनुभव करो। पाक्षिक दिन भी उसकी अनुभूति न हो सके तो चातुर्मासिक दिन तक अवश्य उसे विकसित करो। यदि उस दिन भी उसका अनुभव न हो तो सांवत्सरिक दिन तक अवश्य ही उसका विकास करो। यदि उस दिन भी द्वेष की ग्रंथि नहीं खुलती है, सबके प्रति मैत्री-भावना जागृत नहीं होती है तो समझो कि तुम सम्यग् दृष्टि नहीं हो, धार्मिक नहीं हो।'