संबोधि

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

संबोधि

कुछ समाज में धारणाएं भी प्रचलित हो गईं कि अमुक अमुक तप होने ही चाहिए। कोई न करे या किसी से न हो तो वह अपने आप में हीनता का अनुभव करने लगता है। दूसरे लोग भी जैसे-तैसे प्रेरित करते रहते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि 'तप' तो जीवित रहा किन्तु उसका मूल हार्द गौण हो गया। एक और भी बात है कि तप अच्छा है, प्रीतिकर है तो किसी विशेष समय में कर उसकी इति श्री क्यों कर दी जाती है? मौसमी फूलों की तरह क्या उसका मौसम होता है? महावीर को उसमें आनंद था तो वह सतत चल रहा था। उन्होंने तप के अनुष्ठान के लिए कोई दिन, महीना निर्धारित नहीं किया था। उसकी उन्हें जरूरत थी, रस था और ध्येय में सहयोगी था, इसलिए सदा समुचित प्रयोग करते रहे। किन्तु बाद में कुछ तिथियां और महीने निश्चित से हो गए। बस, वह समय आता है और दौड़-धूप शूरू हो जाती है। बरसात की नदियों की तरह फिर वह शान्त हो जाता है। तप वैसा नहीं है। वह तो गंगा की पवित्रतम धारा की भांति है जो सागर में मिल कर ही आश्वस्त होती है।
ज्ञान और दर्शन चैतन्य का स्वभाव है। उसके लिए स्वतंत्र कोई विशेष आयास नहीं करना होता है। वे चरित्र तप की साधना के परिणाम मात्र हैं। साधना जो है, वह है तपोयोग की। जो कुछ सार-सत्य होता है, वह इससे ही होता है। तप का महत्त्व इसलिए है कि वह समस्त आवरणों को जलाकर चैतन्य को अपने स्वच्छ रूप में प्रस्तुत करता है। आवृत ज्ञान और दर्शन को अनावृत भी यही करता है। इस दृष्टि से तप के सम्बन्ध में बहुत सजग, विवेकवान् और विज्ञ होना चाहिए। अज्ञान तप कष्टकर होता है, साधना में सहायक नहीं है। महावीर ने कहा है-
'मासे मासे तु जो बालो, कुसग्गेण तु भुंजए।
न सो सुयक्खायधम्मस्स, कलं अग्घइ सोलसिं॥
अज्ञानी व्यक्ति महीने महीने का उपवास कर कुश के अग्रभाग पर टिके इतना-सा भोजन करके भी शुद्ध धर्म की सोलवीं कला का भी स्पर्श नहीं करता। बुद्ध ने कहा है- 'नासमझ तप भी करते हैं तो भी नरक में जाते हैं। जिन दो अतियों से बचने की बात कही है उनमें से एक है शरीर को व्यर्थ सताना। श्रोण नाम का राजकुमार भिक्षु भोग से तप की दूसरी अति पर जब उतर गया तब कुछ भिक्षुओं ने बुद्ध से कहा। बुद्ध श्रोण के पास आये और बोले-श्रोण ! तुम कुशल वीणावादक थे।
'हां भन्ते।'
'वीणा बजाने के नियम से परिचित हो ?'
'हां भन्ते।'
'क्या तार बिलकुल ढीले होते हैं तब वीणा बजती है?'
'नहीं।'
'क्या श्रोण! वीणा के तार बहुत कसे हुए होते हैं, तब वीणा बजती है।'
'नहीं भन्ते।'
'श्रोण ! वही नियम साधना का है।'