राष्ट्र संत आचार्य श्री तुलसी

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निखिल बांठिया, बैंगलोर

राष्ट्र संत आचार्य श्री तुलसी

वह समय, जब आज़ादी सिर्फ़ नारा नहीं — हर दिल की धड़कन बन चुकी थी। हर ओर स्वराज का नारा गूंज रहा था, और भारत विदेशी शासन की बेड़ियाँ तोड़ने के लिए संघर्षरत था। यह केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि आत्मसम्मान, एकता और जागृति का भी युद्ध था। इसी दौर में, जब राष्ट्र बाहरी स्वतंत्रता के लिए जूझ रहा था, एक और क्रांति चुपचाप जन्म ले रही थी — वह क्रांति राजनीति की नहीं, बल्कि आत्मा की थी। इस आध्यात्मिक क्रांति के केंद्र में थे आचार्य श्री तुलसी,
जिन्होंने समझा कि सच्ची स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि अंतःकरण के शुद्धिकरण से मिलती है।
दायित्व का प्रथम क्षण
ज़रा सोचिए — बाईस वर्ष की आयु। जीवन का वह समय जब अधिकतर युवा अपने भविष्य की दिशा ढूँढ रहे होते हैं, विचारों में उत्साह होता है और अनुभव अभी आकार ले रहा होता है। ऐसे समय में, आचार्य श्री तुलसी के सामने आया एक अप्रत्याशित आह्वान — तेरापंथ संघ का नेतृत्व संभालने का। यह समाचार सुनकर पूरा संघ कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गया, और स्वयं वे भी मौन हो गए। इतनी कम आयु में यह विराट जिम्मेदारी! हृदय में गर्व से अधिक विनम्र भय था — कहीं यह योग्यता मुझमें है भी या नहीं? पर यही वह क्षण था जब उनके भीतर का साधक जागा।
उन्होंने इस दायित्व को चुनौती नहीं, तपस्या के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने अपने भीतर निश्चय किया कि यह पद प्रतिष्ठा का नहीं, सेवा का माध्यम बनेगा। वे जानते थे कि नेतृत्व का अर्थ आदेश देना नहीं, बल्कि अनुशासन, समर्पण और त्याग के द्वारा उदाहरण बनना है। अपने गुरु की आज्ञा और आशीर्वाद का स्मरण करते हुए उन्होंने मन ही मन कहा — 'यह मार्ग कठिन है, पर गुरु की दृष्टि मेरा संबल बनेगी।' और इसी समर्पण ने उन्हें वह शक्ति दी, जो आगे चलकर केवल संघ ही नहीं, समाज के नैतिक जीवन को भी दिशा देने वाली बनी।
संघ-संयम और आत्म-विकास का काल
कम उम्र में इतना बड़ा दायित्व मिलने पर आचार्य श्री तुलसी का पहला विचार था — 'मुझे स्वयं को तैयार करना है।' वे जानते थे कि अब वे वह केंद्र हैं, जहाँ हर साधु-साध्वी अपने प्रश्नों के उत्तर खोजने आएगा। इसलिए उन्होंने अपने विहार-क्षेत्र को सीमित रखा और अध्ययन, मनन तथा संघ के विकास पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने संघ के संगठन को नई दिशा दी — साधु-साध्वियों की शिक्षा पर बल दिया, और यह संदेश दिया कि समय के साथ चलना आवश्यक है, पर मूल्यों से विचलन नहीं होना चाहिए। युवा आयु में ही यह परिपक्व दृष्टि उनके नेतृत्व की पहचान बन गई।
महिला सशक्तिकरण
वह समय ऐसा था जब अधिकतर स्त्रियाँ घूंघट के भीतर अपनी पहचान दबाकर जीती थीं। घर के आँगन से बाहर कदम रखना भी संकोच और सामाजिक डर से भरा होता था। पर तभी आचार्य श्री तुलसी ने एक अलग ही आवाज़ उठाई — आवाज़ यह नहीं कि परंपरा तोड़ दो, बल्कि यह कि 'नारी को ओट में मत रखो, उसे उभरने दो।' इसलिए उन्होंने साध्वी-संघ की शिक्षा, प्रशिक्षण और नेतृत्व पर विशेष ध्यान दिया। सैकड़ों साध्वियाँ जो कभी संकोच में रहती थीं, उनकी प्रेरणा से पढ़ने-लिखने लगीं और समाज के सामने नए आत्मविश्वास से खड़ी होने लगीं। साध्वी कनकप्रभा जी इसका सबसे उजला उदाहरण बनीं। संकोच से भरी एक साध्वी से वे आगे चलकर तेरापंथ साध्वी-संघ की साध्वीप्रमुखा बनीं— नेतृत्व, लेखन और गंभीर चिंतन की धनी। उनकी प्रगति यह दिखाती है कि जब अवसर मिलता है, तो नारी केवल आगे नहीं बढ़ती— वह मार्ग बनाती है। और यही सबसे बड़ा परिवर्तन था — नारी अब सिर्फ़ घर की दीवारों के पीछे नहीं, समाज की नैतिक दिशा तय करने में भी सहभागी बनने लगी।
अणुव्रत
जब धर्म आचरण से कट जाए, तब छोटे व्रत बड़ी क्रांति बनते हैं। स्वतंत्र भारत में आचार्य श्री तुलसी ने देखा कि देश राजनीति से तो आज़ाद था, पर समाज भीतर से कमज़ोर— धर्म मंदिरों तक सिमट गया था और व्यवहार में प्रामाणिकता घटती जा रही थी। झूठ, अनुचित लाभ, भ्रष्टाचार, क्रोध और नशा जीवन का सामान्य हिस्सा बनते जा रहे थे। मनुष्य पूजा में श्रद्धावान था, पर व्यवहार में सत्य से दूर होता जा रहा था। उन्हें लगा कि राष्ट्र को सुधारने के लिए बड़े अनुष्ठानों की नहीं, छोटे, सरल और व्यवहारिक संकल्पों की आवश्यकता है— ऐसे संकल्प जिन्हें हर व्यक्ति अपनी दिनचर्या में निभा सके। इसी सोच से जन्म हुआ अणुव्रत आंदोलन: सत्य बोलना, नशा न करना, हिंसा और क्रोध पर संयम, ईमानदारी, न्याय, भेदभाव से दूर रहना, और जीवन में सरलता व करुणा बनाए रखना। अणुव्रत आज भी उतना ही आवश्यक है, क्योंकि तेज़ रफ़्तार जीवन में सत्य, संयम और ईमानदारी पहले से कठिन हो गए हैं। यह आंदोलन याद दिलाता है कि प्रगति तभी सार्थक है जब मनुष्य अपने मूल्यों को नहीं खोता— क्योंकि चरित्र ही मानव जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।
राष्ट्र संत
बाईस वर्ष की आयु में आचार्यपद स्वीकारते हुए आचार्य श्री तुलसी ने शक्ति नहीं, चरित्र को नेतृत्व का आधार बनाया। उन्होंने पहले अपने भीतर अनुशासन जगाया, फिर उसी प्रकाश को संघ और समाज में फैलाया— सत्य, संयम और प्रामाणिकता को राष्ट्र के जीवन में बसाने के लिए। उनकी दृष्टि स्पष्ट थी: देश तभी आगे बढ़ेगा जब उसके नागरिक भीतर से सच्चे हों। इसी नैतिक जागरण की यात्रा उन्हें केवल तेरापंथ का आचार्य नहीं, बल्कि भारत को दिशा देने वाला एक राष्ट्रसंत बनाती हैं |