महानता का मसीहा – आचार्यश्री तुलसी

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साध्वी प्रांजलप्रभा

महानता का मसीहा – आचार्यश्री तुलसी

आचार्य तुलसी जन्म से महान थे। महानता उनकी जन्मजात सहचरी थी। बचपन में दीक्षा ग्रहण की और फिर निरंतर अपने ओज व तेज से आगे बढ़ते गए। उन्होंने स्वयं जागृत जीवन जिया और दूसरों को भी जागृत जीवन जीने के सूत्र दिए। वे 19वीं–20वीं सदी के महान करिश्माई व्यक्तित्व थे। विश्व इतिहास में वे ऐसे महान संत थे जिन्होंने अपनी शक्ति, क्षमता, प्रभाव और गतिशीलता से धर्मसंघ का विकासशील नेतृत्व किया तथा मानवता का उत्थान कर अंतरराष्ट्रीय जगत में ख्याति प्राप्त महापुरुष बने।
उस महान पुरुष की महानता को समझने के लिए महानता के नियमों को जानना आवश्यक है। जिस प्रकार गणितज्ञ बनने के लिए गणित के नियम, वैज्ञानिक बनने के लिए विज्ञान के नियम और कलाकार बनने के लिए कला के नियम जानना आवश्यक है, उसी प्रकार महान बनने के लिए महानता के नियमों को जानना जरूरी है। आचार्य तुलसी महान पुरुष बने और उनकी महानता का पहला आधार था —
नया काम करने का साहस
आचार्य तुलसी में नया काम करने का साहस था। नवीन कार्यों का जोखिम लेना उनके स्वभाव का विशिष्ट गुण था। भृगु संहिता में वर्णित उनकी दस भविष्यवाणियों में से एक थी — आचार्य तुलसी नई रेखाएं खींचेंगे। नूतन कार्य करने का यह उत्साह ही उस विकास पुरुष के विकास का आधार बना। यही कारण था कि उन्होंने लगभग हर दशक में कोई नया कार्य किया।
लाडनूं का प्रसंग है। आचार्य श्री महाप्रज्ञ के सान्निध्य में अमृतवाणी के जेसराज सेखानी, आचार्य तुलसी के कार्यक्रमों की वीडियो कैसेट दिखा रहे थे। उनमें आचार्य तुलसी की अनेक मुद्राएं और विविध दृश्य दिखाई दे रहे थे। उनके मुख-विन्यास इतने आकर्षक होते थे कि दर्शक तुरंत प्रभावित हो जाता था। कैसेट रुकते ही आचार्य महाप्रज्ञ मुस्कुराए और बोले — वैष्णव धर्म में भगवान कृष्ण को लीला पुरुष कहा गया है, पर मुझे लगता है कि आचार्य तुलसी भी किसी लीला पुरुष से कम नहीं थे। वे केवल भाव-मुद्राओं के कारण ही नहीं, बल्कि अपने नवीन चिंतन, नवीन अवदानों और नवीन कार्यों के कारण लीला पुरुष कहलाने योग्य थे।
वाणी का तीव्र प्रयत्न
आचार्य तुलसी की महानता का दूसरा आधार था उनकी वाणी का तीव्र प्रयत्न। मध्यान्ह का समय था। आचार्य महाप्रज्ञ के सान्निध्य में प्रज्ञापना सूत्र के 11वें पद पर विचार-विमर्श चल रहा था। आचार्य महाप्रज्ञ बोले — जब वाणी में तीव्र प्रयत्न होता है, तो भाषा के पुद्गल लोकांत तक जाते हैं। आचार्य तुलसी बोलते समय वही तीव्र प्रयत्न करते थे। तीव्र प्रयत्न का अर्थ केवल जोर से बोलना नहीं, बल्कि ऐसा मौलिक प्रभाव पैदा करना जिससे वाणी श्रोता के भीतर को झकझोर दे, उसे प्रेरित कर दे।
सन् 1991 का प्रसंग है। मुझे मुमुक्षु श्रेणी से पर्युषण यात्रा हेतु प्रस्थान करना था। यह मेरी पहली यात्रा थी जिसमें मैं मुखिया बनकर जा रही थी। मन में भय था कि यह जिम्मेदारी कैसे निभाऊंगी। आचार्य प्रवर का मंगलपाठ सुनते समय मेरा भय आँखों से आँसुओं के रूप में बहने लगा। पूज्य गुरुदेव ने मेरी ओर देखते हुए तीव्र ओजस्वी वाणी में कहा — चिंता क्यों करती हो? जो चोंच देता है, वह चुगा भी देता है। यह ओजपूर्ण वाणी का ही प्रभाव था कि मेरी आँखों में आशा और पैरों में गति आ गई। अणुव्रत आंदोलन मानव संस्कृति, नैतिक क्रांति और विश्व-शांति का शंखनाद बना, और भावना को उत्साह का ओज मिला जिससे पर्युषण यात्रा सफल हुई।
संघ-विकास का सतत चिंतन
आचार्य तुलसी की महानता का तीसरा आधार था — संघ विकास का चिंतन। आचार्य महाप्रज्ञ ने तेरापंथ के ऐतिहासिक स्थल गंगाशहर के शक्तिपीठ पर कहा था कि गुरुदेव को अपने शरीर से अधिक संघ की चिंता रहती थी। हर पल यही विचार मन में रहता था कि मेरा संघ कैसे प्रगति करे। शायद वे देवलोक में भी संघ-विकास का ही चिंतन कर रहे होंगे।
विकास पुरुष आचार्य तुलसी ने संघ की तेजस्विता के लिए समय-समय पर अनेक नवीन और अभूतपूर्व आयाम प्रस्तुत किए—
पारमार्थिक शिक्षण संस्थान व समण श्रेणी की स्थापना
आगम संपादन
साधु–साध्वी समाज में शिक्षा, शोध, सेवा और कला का विकास
साधना-विकास हेतु अनुशासन, प्रेक्षा, स्वाध्याय, संयम और भावनात्मक एकता
• योगक्षेम वर्ष जैसे आयोजनों का प्रारंभ
• विशाल साहित्य-सृजन
• सुदूर विहार यात्राएँ
आचार्य तुलसी को महान बनाने वाला एक और आधार था — मानवता का विकास। उनका संपूर्ण जीवन मानवतावादी दृष्टिकोण के प्रति समर्पित था। वे मानवता और मानव धर्म के उद्घोषक, प्रचारक और संपोषक थे। अपना परिचय देते समय कहते थे — मैं पहले मानव, फिर जैन, और जैनों के एक संप्रदाय तेरापंथ का आचार्य। जो मानव बन गया, वह जैन, हिन्दू, मुसलमान, ईसाई — सबकुछ बन गया। यदि मानव मानव नहीं बना, तो कुछ भी नहीं बना। उनका यह उद्घोष उन्हें मानवता के मसीहा के रूप में प्रतिष्ठित करता है।