काल के भाल पर स्वर्णिम अक्षरों में अमिट नाम – आचार्य तुलसी

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मुनि चैतन्य कुमार ‘अमन’

काल के भाल पर स्वर्णिम अक्षरों में अमिट नाम – आचार्य तुलसी

संयमः खलु जीवनम् — संयम ही जीवन है। जिनका जीवन संयमी
था, जिन्होंने असंख्य जीवों को संयम की उत्कृष्ट साधना के मार्ग पर आरोहण हेतु दीक्षित किया, शिक्षित किया। जिन्होंने अनगिनत श्रावक–श्राविकाओं और भक्तों को संयम मार्ग पर आगे बढ़ने हेतु प्रेरित किया। ऐसे महान आत्मा गणाधिपति तुलसी के 100वें दीक्षा दिवस की पूर्णता प्रेरणा और गौरव का विषय है।
भारतीय संस्कृति का प्राण है संयम। संयम अर्थात् नियंत्रण। संयम सुख का राजमार्ग है। संयम किसका हो? जीवन की प्रत्येक क्रिया में। मन-वचन-काय — तीनों में संयम पुष्ट होना चाहिए। जहाँ वाणी, विचार, रहन-सहन और खान-पान का संयम नहीं होता, वहाँ शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक—सभी प्रकार की समस्याओं का जन्म होने लगता है। मन-वचन-काय की असत् प्रवृत्ति जहाँ होती है, वहाँ नित-नई समस्याएँ पैदा होना निश्चित है। संयमी साधक को संयम जीवन में जो आनंद प्राप्त होता है, वह असंयम में कभी संभव नहीं।
आचार्य तुलसी ने बाल्यावस्था में ही संयम मार्ग पर प्रस्थान कर दिया। जिस वय में बालक खाने-पीने, खेलने-कूदने में मग्न रहते हैं, उस उम्र में संयम स्वीकार कर उन्होंने आंतरिक चेतना को जागृत किया। ग्यारह वर्ष की आयु क्या होती है? इतनी छोटी उम्र में संयम अपना लेना, साधु बनकर साधना-पथ पर अग्रसर हो जाना किसी आश्चर्य से कम नहीं। बाल्यावस्था में ही साधु बनकर उन्होंने गुरु के प्रत्येक इंगित को समझा और उसी का परिणाम यह हुआ कि वे तेरापंथ जैसे एक आचार, एक विचार और एक आचार्य परंपरा वाले संगठित धर्मसंघ के आचार्य बने।
भौतिक सुख नहीं, बल्कि आध्यात्मिक सुख और शांति की चाह रखने वाला ही संयम के राजमार्ग पर चल सकता है। अणुव्रत का अमृतदान देकर उन्होंने प्यासी भारतीय धरा को सरसब्ज कर दिया। सचमुच, अणुव्रत के अवदान से उन्होंने भारतीय जनमानस को झकझोर दिया। उनकी बड़ी सोच, दूरदर्शिता और व्यापक चिंतन ने लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाए।
अणुव्रत आंदोलन के माध्यम से सामान्य जन से लेकर देश के उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों तक उनका संपर्क हुआ, जिससे पूरे राष्ट्र में नैतिकता और चारित्रिक उन्नयन की लहर उठी। जनमानस में शांतिपूर्ण जीवन के लिए तथा शिक्षा क्षेत्र में बालकों के उज्ज्वल भविष्य हेतु जीवन-विज्ञान का अवदान अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। स्वयं आचार्य तुलसी और उनके यशस्वी उत्तराधिकारी आचार्य श्री महाप्रज्ञ के अनुपम सहयोग से तेरापंथ धर्मसंघ को गगनचुंबी ऊँचाइयाँ प्राप्त हुईं। उनके अवदानों को चिह्नित करते हुए भारत सरकार, प्रांतीय सरकारों तथा अनेक संस्थाओं ने उन्हें विविध अलंकरणों से विभूषित किया। तेरापंथ धर्मसंघ के इतिहास में आचार्य तुलसी का कार्यकाल काल के भाल पर स्वर्णिम अक्षरों में अंकित रहेगा—अमिट, अविस्मरणीय।
आज अनावश्यक संग्रह, बढ़ती विलासिता, अर्थार्जन की तीव्र लालसा, मनोरंजन के बढ़ते साधन, सौंदर्य प्रसाधनों का मोह, इंद्रियों के प्रति असंयम तथा इच्छाओं पर नियंत्रण का अभाव—ये सभी मानव जीवन के लिए खतरनाक मोड़ हैं। इस स्थिति में यदि व्यक्ति व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए संयम की भावना को पुष्ट करे, तो समाज में सौहार्द, नैतिकता और नीति-निष्ठा कायम रह सकती है।
आचार्य श्री तुलसी के शतकीय दीक्षा दिवस की पूर्णता पर यदि मानवजाति संयम का संकल्प ले, तो भारत का भविष्य निश्चय ही स्वर्णिम बन सकता है। इस दीक्षा दिवस के शताब्दी वर्ष में हम सभी अधिक से अधिक संयम को जीवन में पुष्ट करने का संकल्प लें।