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विलक्षण व्यक्तित्व से सम्पन्न – आचार्य श्री तुलसी
जीवन तो हर प्राणी जीता है, पर ऐसे लोग विरले होते हैं जो एक जीवन्त जीवन जीते हैं। ऐसे ही एक महापुरुष थे, जिन्हें दुनिया आचार्य श्री तुलसी के नाम से जानती है। मात्र ग्यारह वर्ष की आयु में उन्होंने गृहस्थ जीवन त्यागकर सन्यास का पथ स्वीकार कर लिया। बाईस वर्ष की अवस्था में वे धर्मसंघ के अधिशास्ता बन गए। लगभग साठ वर्षों तक उन्होंने गण का संचालन किया और अंत में नश्वर जीवन का संदेश देकर अमर बन गए। आचार्य श्री तुलसी का जीवन स्वयं में एक प्रेरणा है।
अप्रमत्त पुरुष
भगवान महावीर के सूत्र 'उट्ठिए णो पमायए' को उन्होंने केवल पढ़ा ही नहीं, बल्कि पूरी तरह आत्मसात किया। तभी तो उम्र के उस पड़ाव पर, जहां सामान्य व्यक्ति विश्राम चाहता है, आचार्य श्री तुलसी स्वयं को कार्यक्षम मानते रहे। प्रातः चार बजे से रात्रि दस बजे तक सतत परिश्रम करना उनके लिए सामान्य बात थी। वे कभी थकते नहीं थे। आचार्य श्री तुलसी के निर्वाण के बाद उनके उत्तराधिकारी आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने एक गीत में इस भाव को इन शब्दों में व्यक्त किया — 'जीवनभर काम करूंगा, गण का भंडार भरूंगा। संकल्प अटूट निभाया रे।'
किशोरावस्था में ही आचार्य श्री तुलसी पर शैक्षिक संतों को पढ़ाने का दायित्व था। उनका अनुशासन सहज प्रतीत होता, पर उसका लक्ष्य सदैव संतों का व्यक्तित्व निर्माण ही रहता था। प्रश्न उठता है कि गुरुदेव कालूगणी ने एक किशोर मुनि को यह दायित्व क्यों सौंपा? चिंतन करने पर स्पष्ट हो जाता है कि जो स्वयं जागरूक होता है, वही दूसरों को जागरण की प्रभावी प्रेरणा दे सकता है। वे अंतिम समय तक बाल संतों के निर्माण में जुटे रहे। कभी कोई संत कह देता, 'आज आपको अधिक परिश्रम हो गया है, बाकी अध्ययन कल कर लेंगे।' वे तुरंत कहते, 'क्यों? कल किसने देखा!' जो व्यक्ति समय को महत्व देता है, समय भी उसकी कद्र करता है।
विकास पुरुष
आचार्य श्री तुलसी ने अपने जीवन में जो भी सपना देखा, उसे पूरा किया। उनकी अभिलाषा थी कि आत्म-विकास के साथ धर्मसंघ का विकास हो, मानवता का विकास हो। वे इस दिशा में सदैव जागरूक और सक्रिय रहे। आत्म-विकास के लिए वे खाद्य संयम, वाणी संयम और सर्वेन्द्रिय संयम के द्वारा स्वयं को साधते रहे। पूज्य कालूगणी की अंतिम शिक्षा को ध्यान में रखकर उन्होंने धर्मसंघ में शिक्षा, शोध और आध्यात्मिक नवाचारों के नए आयाम विकसित किए।
एक बार मुनि अवस्था में उन्होंने मुनि नथमल जी (आचार्य महाप्रज्ञ) से पूछा था, 'क्या तुम मेरे जैसे बनोगे?' मुनि नथमल जी ने उत्तर दिया, 'आप बनाएंगे तो बन जाऊंगा।' आचार्य तुलसी ने उन्हें न केवल अपने जैसा बनाया, बल्कि गण के शीर्ष शिखर तक पहुंचाया। इसी प्रकार मुनि मुदित को भी साधते हुए उन्होंने उन्हें आचार्य श्री महाश्रमण के पद तक पहुंचाया। साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा जी, जिन्होंने संपूर्ण साध्वी समाज का नेतृत्व किया, वे भी आचार्य तुलसी की अमूल्य देन हैं।
नैतिक और चारित्रिक मूल्यों के बिना जीवन का क्या अर्थ है? अधिकांश समस्याएं अनैतिकता से ही उत्पन्न होती हैं। इस सच्चाई को अनुभव कर उन्होंने झोपड़ी से लेकर सत्ता के महलों तक अणुव्रत का प्रकाश फैलाया। राष्ट्र की ज्वलंत समस्याओं के समाधान हेतु भी उनके अनेक कार्य इतिहास में दर्ज हैं। भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट के अवसर पर कहा गया कि यह संपूर्ण राष्ट्र की ओर से उनके प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।
समता पुरुष
भगवान महावीर के दर्शन का मुख्य तत्व है समता। साधक का लक्ष्य जब आत्म-विकास और लोककल्याण होता है, तो समता की साधना आवश्यक होती है। आचार्य श्री तुलसी समता के जीते-जागते प्रतीक थे। उनके जीवन में जहां अपार सम्मान मिला, वहीं तीव्र विरोध भी झेलना पड़ा। उन्होंने अपने पूर्वाचार्यों की जीवन-शिक्षाओं को सामने रखकर विरोध की परवाह किए बिना सत्य के मार्ग पर बढ़ते रहना अपना नियम बना लिया था।
सन् 1984 में अणुव्रत अधिवेशन के विरोध में सांप्रदायिक तत्वों ने शहर की दीवारों पर पोस्टर चिपका दिए। अधिवेशन स्थल जाते समय आचार्य श्री ने उन्हें देखकर कहा, 'इन लोगों ने हमारा कितना हित किया! दोपहर की इस धूप में डामर की सड़क पर नंगे पांव चलना कठिन होता, पर इन पोस्टरों ने गर्मी के ताप से रक्षा कर ली।' उन्होंने उसी अवसर पर कहा, 'जो हमारा करे विरोध, हम उसे समझें विनोद।' समता साधना का यह श्रेष्ठ उदाहरण है। वे कहते थे, 'मुझे जितना सम्मान मिला, उतना ही विरोध भी मिला। यदि केवल सम्मान मिलता तो अहं आ जाता, और केवल विरोध मिलता तो निराशा। इन दोनों ने मेरे जीवन में समता बनाए रखी।'
अनुशासन पुरुष
अनुशासन सफलता का अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र है। आचार्य श्री तुलसी सदैव अनुशासन का अनुसरण करते रहे। अनुशास्ता के लिए यह आवश्यक है कि वह सबको साथ लेकर चल सके। उसने आत्मानुशासन को इस रूप में साधा कि किसी को कठोरता भी न लगे और उद्देश्य भी पूरा हो जाए। उन्होंने कहा, 'निज पर शासन, फिर अनुशासन।' उन्होंने गलती के सुधार का पूरा अवसर दिया, पर जानबूझकर की गई भूलों पर दृढ़ अनुशासन भी किया। अच्छे कार्य के लिए प्रेरणा और प्रशंसा, तथा त्रुटि के लिए उचित मार्गदर्शन — यही एक कुशल अनुशास्ता की पहचान है।
विलक्षण पुरुष
आचार्य श्री तुलसी के जीवन के अनेक कार्य विलक्षण थे, जिनमें सबसे अद्भुत था अपने ही पद का विसर्जन। सत्ता के शिखर पर बैठे लोग इस पर आश्चर्यचकित रह गए। आज जहां व्यक्ति नाम, धन और पद प्राप्त करने की होड़ में लगा रहता है, वहीं आचार्य तुलसी ने इन सबसे ऊपर उठकर संसार को एक अद्वितीय उदाहरण दिया। लगभग छह दशकों तक गण का निर्देशन करने के बाद, पूर्ण सामर्थ्य के समय, जब अनुयायियों का अपार विश्वास उनके प्रति था, तब उन्होंने अपने पद का विसर्जन कर उत्तराधिकारी को प्रतिष्ठित किया।
समण श्रेणी की स्थापना भी उनका एक अनूठा योगदान है। ऐसी विलक्षणता के लिए अटूट साहस, समय की सटीक पहचान, आत्मविश्वास और दूरदर्शी सोच चाहिए होती है। इन्हीं गुणों के कारण आचार्य श्री तुलसी ने जितना जीवन जिया, वह एक जीवन्त जीवन था — अपने लिए, धर्मसंघ के लिए और समस्त मानवता के लिए। ऐसे ओजस्वी, तेजस्वी, यशस्वी, मनस्वी परम पुरुष आचार्य श्री तुलसी का 100वां दीक्षा दिवस केवल तेरापंथ धर्मसंघ ही नहीं, संपूर्ण मानव-जाति के लिए गौरव का क्षण है।