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मैं कोई सम्राट नहीं हूं : आचार्य तुलसी
युगप्रधान आचार्य तुलसी एक महान आचार्य थे। महान इसलिए नहीं कि उनकी यश-कीर्ति दिग्-दिगंत में फैली हुई थी, बल्कि इसलिए कि उन्हें सुविधावादी जीवन पसंद नहीं था। श्रमशीलता ही उनके जीवन का व्रत था, अखंड संकल्प था—इसीलिए वे महान थे। वे स्वयं श्रमशील जीवन जीते थे और अपने शिष्य-शिष्याओं को भी सदैव श्रमशीलता की प्रेरणा दिया करते थे। इसी कारण उन्होंने व्यवहार बोध में भी लिखा है—
प्रतिस्रोत का पथ जो हमने अपनाया है,
खबरदार जो सुविधावाद पनप पाया है।
मैं अपना परम सौभाग्य मानता हूं कि मुझे भी लगभग दो वर्षों तक गुरुदेव तुलसी की एकदम निकटता से सेवा करने का अवसर मिला। घटना उस समय की है जब गुरुदेव तुलसी लाडनूं में जैन विश्व भारती में विराज रहे थे। शाम लगभग चार बजे गुरुदेव पंचमी समिति के लिए जहां पधारते थे, वहां कई बार मैं स्वयं पूज्य गुरुदेव के लिए पानी आदि की व्यवस्था करता था। एक बार गर्मी का समय था। मैं पानी की पात्र रखने गया तो देखा कि वहां कुछ दूरी तक का रास्ता भयंकर धूप के कारण अत्यंत गरम हो गया था। मैंने तुरंत मुनि जम्बूकुमार जी को बुलाया और हम दोनों ने उस गरम फर्श पर कुछ दूरी तक कंबल बिछा दिया। कुछ समय बाद गुरुदेव तुलसी मेरे हाथों का सहारा लेकर पधार रहे थे। जैसे ही वे उस गरम स्थान के पास पहुंचे, उन्होंने कंबल बिछा हुआ देखा। उन्होंने थोड़ी अनुशासनात्मक शैली में पूछा—यह किसने बिछाया? हम घबरा गए, फिर भी मैंने ही हिम्मत करके कहा कि गुरुदेव, यहां की फर्श बहुत गरम है, इसलिए हमने यह बिछाया है।
पूज्य गुरुदेव ने थोड़े कठोर शब्दों में कहा—
'मैं कोई सम्राट नहीं हूं! इतना भी सहन नहीं कर सकता क्या? हटाओ इनको।'
हमने विनती भी की, परंतु वे नहीं माने और अंततः साइड से होकर भीतर पधारे।
शौच का कार्य सम्पन्न होने के बाद जब वे बाहर पधारे, तब वे 'शासनश्री' मुनि श्री बालचंद जी स्वामी की ओर मुखातिब होते हुए प्रेम से बोले—
'बालजी! ये टाबरियां म्हारो कित्तो ध्यान राखे हैं। यानै पांच-पांच कल्याणक बक्षीस, और बालजी! थांनै भी बक्षीस।'
हम दोनों बाल संत पूज्य गुरुदेव का असीम वात्सल्य पाकर एकदम गद्गद हो गए। इस तरह मैंने निकटता से उन्हें देखा और जाना कि वे कभी भी सुविधावाद के पक्षधर नहीं थे।