रचनाएं
गुरु तुलसी को नमन हमारा
गुरु तुलसी को नमन हमारा,
वामन रूप में छिपा हुआ था, वर विराट व्यक्तित्व तुम्हारा।
दीक्षा सुदी सुपावन अवसर, संयम राह चले जग सारा।।
सर्पराज ने फण फैलाकर शुभ भविष्य संकेत दिया,
तुलसी को पाकर कालू गुरु ने गण को निश्चिंत किया।
बाईस वर्ष की वय में आचारज बन संघ को सदा निखारा।।
नन्हे-नन्हे कदमों से पूरे भारत को नाप लिया,
हर व्यक्ति चरित्र निष्ठ हो अणुव्रत का शंखनाद किया।
राष्ट्रपति भवन तक गूंजा 'संयम ही जीवन है' नारा।।
तव चरणों में हुआ समर्पित उसको नव आकार दिया,
अनगढ़ पत्थर में भी तुमने प्राणों का संचार किया।
सबको आकर्षित करता था तेरा मनमोहक उजियारा।।
कितने संघर्षों को झेला फिर भी रहे अडिग प्रण में,
जो सोचा वह करके दिखलाया बढते रहे विरोधी क्षण में।
राहों में आने वाले कांटों को तुमने सदा बुहारा।।