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तेरापंथ धर्म संघ को विश्वविख्यात बनाने वाले युगप्रधान आचार्य श्री तुलसी
जन्म और जीवन दो बिन्दु हैं, जन्म से जीवन का महत्व ज्यादा होता है। रूप और गुण दो बिन्दु हैं, रूप से गुण का महत्व अधिक होता है। अवस्था और अर्हता दो बिन्दु होते हैं, अवस्था से भी अर्हता का मूल्य ज्यादा होता है। हमें इन बिन्दुओं पर अपना ध्यान विशेष रूप से केन्द्रित करना है। आचार्य श्री तुलसी का जन्म राजघराने में नहीं हुआ, परंतु अपने सुश्रम और गुरु-दृष्टि का सतत जागरूकता से पालन करने से मात्र 22 वर्ष की अवस्था में उन्होंने अपने दीक्षा-प्रदाता अष्टमाचार्य कालूगणी का मन जीत लिया था। उनकी दृष्टि में आप विशेष स्थान बना चुके थे। इसका सुपरिणाम था कि कालूगणी ने आपको अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। मात्र तीन दिन आप युवाचार्य रहे। कालूगणी के स्वर्गवास होते ही आप विशाल तेरापंथ धर्मसंघ के नवमाचार्य बने।
22 वर्ष की अवस्था में आचार्य बनना और संघ का संचालन करना अपने आप में तेरापंथ समाज के लिए प्रथम अवसर था। परंतु आपकी कार्यशैली देखकर सब आश्चर्यचकित रह गए। आचार्य श्री तुलसी से पूर्व का तेरापंथ और आचार्य श्री तुलसी के युग का तेरापंथ — दोनों में बहुत बड़ा परिवर्तन व संशोधन देखने-सुनने को मिलता है।
आचार्य श्री तुलसी ने केवल साधु-साध्वियों का ही नहीं, श्रावक-श्राविकाओं का जो निर्माण किया वह अन्य समाजों के लिए प्रेरणा है। धर्मसंघ के प्रत्येक व्यक्ति का कैसे विकास हो, इसके लिए नाना संगठन बनाए गए — जैसे छोटे बालक - बालिकाओं के लिए ज्ञानशाला, उनसे बड़े किशोर मंडल और कन्या मंडल, तथा उससे ऊपर युवक परिषद् और महिला मंडल। समवयस्क लोगों के सर्वांगीण विकास हेतु शिविरों की व्यवस्था की गई, जिनमें गुरुदेव स्वयं अपना अमूल्य समय देकर प्रशिक्षण प्रदान करवाते, ताकि उनका आचार, विचार और अनुशासन अक्षुण्ण बना रहे।
आचार्य श्री तुलसी ने जैन एकता के लिए कई प्रयास किए और उनमे सफलता भी प्राप्त हुई। वे एक सम्प्रदाय के आचार्य होते हुए भी जनकल्याण की भावना से अणुव्रत,प्रेक्षाध्यान, जीवन-विज्ञान जैसे अवदानों द्वारा आबालवृद्ध के विकास हेतु निरंतर प्रयत्नशील रहे। जैन-अजैन, हिन्दू-मुस्लिम, पढ़े-लिखे, अनपढ़, महिला-पुरुष, मजदूर-व्यापारी—सबको आपने इन अवदानों के माध्यम से व्यसनमुक्त व मानवीय गुणों से युक्त बनाया।
देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी आपके अवदानों से अत्यधिक प्रसन्न थे और इनके व्यापक प्रचार-प्रसार में अपना महनीय सहयोग प्रदान करते थे। राष्ट्रपति जी ने आपके समक्ष अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि 'आपको सरकार की आवश्यकता नहीं है, परंतु सरकार को आप जैसे परोपकारी संतों की आवश्यकता है। हम पैसे खर्च कर जो कार्य नहीं करा सकते, वह कार्य आप स्थान-स्थान पर भ्रमण कर लोगों को नैतिक, प्रामाणिक व व्यसनमुक्त बनाकर रहे हैं। ऐसे संत कम हैं, जो गांव-गांव, प्रांत-प्रांत भ्रमण कर लोगों को जीने की कला सिखा रहे हैं। आप केवल जैन बनाने के लिए नहीं, बल्कि सबको ‘गुड मैन’ बनाने के लिए प्रयासरत हैं।'
आचार्य श्री तुलसी का व्यक्ति-निर्माण के प्रति अनवरत प्रयास रहता था, क्योंकि परिवार, समाज, देश और विश्व-उत्थान का सपना इसके बिना संभव नहीं है। गुरुदेव तुलसी की दृष्टि सदैव दूरदर्शी होती थी। आज हम देख रहे हैं कि बाल-विवाह, मृत्युभोज, घूंघट-प्रथा आदि सामाजिक कुरीतियों में जो सुधार आया है, वह आचार्य श्री तुलसी के उपदेश और प्रयासों का ही परिणाम है। नारी-शिक्षा का जो क्रम आज समाज में बढ़ा है, वह भी कल्पनातीत कहा जा सकता है।
आज साध्वियां,समणियां, उपासिकाए, ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाएं — इनकी लेखन - वक्तृत्व क्षमता देखकर बड़े-बड़े विद्वान भी आश्चर्यचकित हो जाते हैं। जो तेरापंथ समाज मारवाड़, मेवाड़, हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र तक सीमित था, वह आज समूचे भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में अपनी पहचान बना चुका है—यह सब आचार्य श्री तुलसी की सुदीर्घ दृष्टि का परिणाम है। आज तेरापंथ धर्मसंघ का साहित्य केवल जैनों के लिए ही नहीं, जन-जन के लिए उपयोगी है। प्रचार-प्रसार के कारण जन-जन में आस्था का संचार हुआ है।
तेरापंथ धर्मसंघ में सबसे कम उम्र में आचार्य बनने वाले और सबसे अधिक समय तक आचार्य पद पर सुशोभित होने वाले आचार्य श्री तुलसी की दीक्षा शताब्दी पर, आचार्य श्री महाश्रमण जी के शासनकाल में जो योगक्षेम वर्ष का भव्य आयोजन हो रहा है, वह व्यक्ति, परिवार, समाज, देश और विश्व के लिए प्रेरणा बने—इन्हीं मंगलभावों के साथ, शिक्षा - प्रदाता, दीक्षा - प्रदाता, भाग्य - विधाता गुरुदेव तुलसी को कोटि-कोटि वंदन।