तुलसी थे जन जन के राम...

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अर्जुन मेड़तवाल, उधना

तुलसी थे जन जन के राम...

संघर्षों नें भी सदा मुस्कुराते रहे, सचमुच तुम रणधीर थे।
हर क्षण करते रहे पुरूषार्थ, सचमुच तुम कर्मवीर थे।
अणुव्रत, प्रेक्षा, जीवन विज्ञान के है महान उद्गाता-
नाम, भिन्न था चेहरा भिन्न था, बाकी तुम साक्षात् महावीर थे।
तुलसी तुम्हारी वाणी को सुनकर, शैतान भी इन्सान बन गये।
तुम्हारे पावन चरणों में आकर, नादान भी महान बन गये।
पता नहीं कौन सी करामात थी तुम्हारे व्यक्तित्व में
कि औरों के दिए अभिशाप भी, तुम्हारे लिए वरदान बन गये।।
तुलसी तुम तो थे, इन्सान के रूप में एक फरिश्ता।
पता नहीं तुम्हारे साथ था, कितने जन्मों का रिश्ता।
कि जब भी देखता था, मैं तुम्हारे मुख-मंडल को
तो महक उठता था, मेरे जीवन का गुलदस्ता।।
तुलसी तुम तो थे जन-जन के राम।
हमारी उनन्त श्रद्धा के, तुम थे परम धाम।
धन्य हुई यह वसुन्धरा, गुरूवर तुम्हें पाकर
तुम्हारे चरणों में हमारा, कोटि कोटि है प्रणाम।।
तुमको हमने करीव से देखा, तो लगा तुम ऐसे थे।
तारों की बारात में तुम, हंसते हुए चांद जैसे थे।
था घटाओं के पैबन्द से, झांकते हुए आफताब
फिर दुनिया को बताएं तो कैसे, कि तुम कैसे-कैसे थे?।।
तुम्हारे आने से, मानवता को नई राह मिल गई थी।
तुम्हारे शासन में, भैक्षव शासन को अनन्य चाह मिल गई थी।
तुम्हारे विरल व्यक्तित्व का, करिश्मा ही अजीब था प्रभो।
तुम्हारे दिशा-दर्शन से, गण को सबकी वाह-वाह मिल गई थी।।
सहकर कष्ट अनेकों तुमने, भव-भव का बन्धन काटा।
मुस्कुराते रहे विरोधों में पर, नहीं किसी को डांटा।
तुम्हारे वियोग में आज भी, आंसू बहा रही है दुनिया
क्यों कि, विष की प्यालियां तुम पीते रहे और, अमृत सबको बांटा।
लेकर आए तुम इस धरती पर, एक नया उजियारा।
अणुव्रत के रूप् में दिया देश को, तुमने नूतन नजारा।
हे प्राणेश्वर, हे करूणेश्वर, सुन लो हमारी अरदास
मानवता को राह दिखाने, तुम्हें आना होगा दुबारा।।