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आचार्य श्री तुलसी-एक महान कलाकार
तुलसी तुम जीवन विश्वास, लाए गण में नव मधुरिमा।
नाम तुम्हारा सबल सहारा, भरता कण-कण में उल्लास।।
आचार्यश्री तुलसी के जीवन को जिस किसी कोण से देखा जाये तो उसमें विविधताओं का संगम मिलता है, उनका बचपन, मुनि जीवन व इनका आचार्यकाल जन-जन को अभिसिंचित प्रेरणा देने वाला था, अध्यात्मदर्शन, संस्कृति व मानवीय चरित्र के लिए अहिंसा के प्रखर प्रवक्ता थे। संयम ही जीवन है। इस घोष को बुलंद करते हुए सबको संयममय जीवन जीने की प्रेरणा दी। तेरापंथ उनकी शक्ति का स्रोत था और वे तेरापंथ की शक्ति के केन्द्र थे।
गुरुवर ने तेरापंथ की पहचान के तीन घोष दिए जिनमें तीसरा घोष था व्यसन मुक्त जीवन संसार, गुरुवर का यह स्वप्न था कि समाज का हर युवक हर व्यक्ति व्यवसन-मुक्त जीवन जीएं, राजस्थान में जहां नारी जाति घूंघट से बाहर आने की कल्पना थी नहीं कर सकती थी। वहां उन्हें जागृत कर धर्म आंदोलन में लगा कर संपूर्ण मानव जाति को कल्याण का मार्ग दिखाया। मानव का आचरण बदले इसके लिए भगवान महावीर की आत्मा साधना के सूत्र की समाज के समक्ष सरल भाषा में व्याख्यायित किया। सुधरे व्यक्ति, समाज व्यक्ति से राष्ट्र स्वयं सुधरेगा आदि नारे देकर संपूर्ण मानव जाति के सुधार के लिए बहुआयामी कार्यक्रम प्रस्तुत किए। महाव्रतों को आम जनता अपने जीवन में आंशिक रूप से ही
सही पर उतारे, उसके लिए अणुव्रत की परिकल्पना का यर्थाथ रूप प्रस्फुटित किया।उन्होंने न केवल अणुव्रत आंदोलन की शुरुआत की अपितु इसके माध्यम से नैतिकता व सदाचार की आवाज घर-घर तक पहुंचाई। अस्पृश्यता धर्म के मस्तक पर कलंक का रीण है। जाति प्रधान , पर्दाप्रथा जैसी रूढ़ धारणा को तोड़ने में समय श्रम व शक्ति लगाने पर सघन प्रयासों से समाज की मानसिकता में अंतर आने लगा। तेरापंथ संघ में साध्वी समाज के शिक्षा विकास को आचार्य तुलसी के प्रयत्न पुरुषार्थ व पालन पोषण ने धर्म संघ नई राह दिखाई। पारमार्थिक शिक्षण संस्था जो आज अनेक साध्वियों व समणियों के निर्माण स्थली के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। गुरुदेव तुलसी ने प्रबुद्ध युवकों की टीम जो सावधिक समण दीक्षा स्वीकार कर धर्म प्रचार-प्रसार कर सके उस हेतु समण दीक्षा का क्रम प्रारम्भ किया। इस प्रकार तुलसी का अनुकरण हम सबका लक्ष्य हो। वह दिव्य, अलौकिक, तेजोमय, दीप्ति व क्रांतिमय ज्योति अदृश्य लोक से भी हमारा पक्ष प्रदर्शन करती रहे। यह मेरी अन्तर अभिलाषा है।