संतान की परवरिश में माँ की भूमिका कार्यशाला का आयोजन

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गंगापुर, कालू।

संतान की परवरिश में माँ की भूमिका कार्यशाला का आयोजन

संतान की परवरिश में मां की भूमिका कार्यशाला में बोलते हुए मुनि प्रसन्न कुमार ने कहा जैसे मि‌ट्टी के घड़े के निर्माण में कुम्भकार की भूमिका होती है वैसे ही एक दृष्टी से प्रारंभिक समय में माँ की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। व्यक्ति निर्माण करना पुरुष्कार्य होता है। जन्म से पहले 9 मास के पिरियड में ही बच्चे का काफी निर्माण हो जाता है। जैसे भगवान महावीर के त्रिशला माँ के गर्भ मे रहे उस समय ज्ञानी पण्डितों ने त्रिशला को २२ बातें (साव‌धानियां) बताई। कि तुम ध्यान रखोगी तो महापुरुष होगा। जन्म के बाद बच्चे की परवरिश की जाती है वही महत्व रखती है। किन्तु जन्म से पहले उस बच्चे को क्या बनना वह संस्कार माँ के हाथ में है। माँ बच्चे की पहली गुरुणी होती है। महात्मागांधी ने भी जीवनी में लिखा मेरी अनपढ़‌ माँ ने मुझे गांधी से महात्मा गांधी बना दिया। आजकी पढ़ी लिखी माताओं के लिए एकमहात्मा का निर्माण करना है एक चुनौती है। हम दो हमारे एक संतान का भी निर्माण भी कठिन हो रहा है। सुधार की जगह बिगड़‌ने का माहौल ज्‌यादा बढ़ गया है। मौलिकगुणों के हा्स से बच्चों में उन्माद,प्रमाद असहिष्णुता, विलासिता का माहौल ज्यादा बढ़ने से अच्छी और भरोसे मंद संतान की कल्पना धु‌मिल न हो जाए। माता पिता इ‌स धारणा को बदल दे कि बच्चे की हर ख्वाइस को पूरा करना चाहिए। गलत प्रोत्साहन बिगड़‌ने का कारण बनता है। अनुशासन सिखाएं। मौबाइल हिंसक संस्कार के खिलौन से दूर रखे। इसी क्रम में मुनी श्री धैर्य कुमार ने अपने उद्धबोधन में कहा कि बच्चों को जो संस्कार देने हैं वह गर्भ में ही दे दिए तो बच्चों को जिंदगी भर याद रहता है एक घटना के माध्यम से भी समझाया| प्रेरणा गीत से मीटिंग की शुरुआत की गई| संयोजन मंत्री प्रीती रांका ने किया |