गुरुवाणी/ केन्द्र
अणुव्रत के छोटे-छोटे नियमों से हो सकता है मानव जीवन का कल्याण : आचार्यश्री महाश्रमण
मेवाड़ धरा को पावन करने के पश्चात् मारवाड़ की धरा को आध्यात्मिकता से आपलावित करने और जन-जन के मानस को अध्यात्म की ज्ञान गंगा से अभिसिंचन प्रदान करने के लिए जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी प्रातःकाल कोट सोलंकियान से लगभग 7 किमी का मंगल विहार परिसंपन्न कर मगलतालाब में स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे।
विद्यालय परिसर में आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में आगम वांग्मय के माध्यम से अपनी पावन देशना प्रदान करते हुए आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कहा कि आदमी का जीवन धर्ममय बन जाए ऐसा प्रयास करना चाहिए। यद्यपि धर्मस्थान अलग-अलग भौतिक रूप में भी होते हैं कही मंदिर, कहीं जैन स्थानक, उपाश्रय, तेरापंथ भवन, चर्च आदि। धर्माराधना, धर्मसाधना, प्रवचन आदि के लिए इन धर्मस्थानों की उपयोगिता भी होती है। धर्मस्थान होने से लोगों को इकट्ठा होने का एक सार्वजनिक केन्द्र मिल जाता है। किसी के घर में जाने में भले ही कोई संकोच करे लेकिन धर्मस्थान तो सभी का होता है, वहां लोग सहर्ष उपस्थित हो सकते हैं और धर्माराधना करते हैं।
आदमी को यह प्रयास करना चाहिए कि हमारा जीवन भी धर्मस्थान बन जाए। जीवन में धर्म आ जाए, जीवन के व्यवहार में धर्म जुड़ जाए, कर्म के साथ धर्म भी जुड़ जाए तो आदमी जहां भी जाएगा धर्म और धर्मस्थान उसके साथ रहेंगे। ऐसा व्यवहार जो महान व्यक्तियांे ने किया है और जो पवित्र है, उस व्यवहार को आचरित करने वाला व्यक्ति गर्हा को प्राप्त नहीं होता है। अतः जीवन व्यवहार में धर्म आए। परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी ने अणुव्रत आन्दोलन का प्रवर्तन किया और उसे बढ़ाया। अणुव्रत ऐसा धर्म है जो जीवन के व्यवहार में रखा जा सकता है। आदमी कहीं भी जाए, कभी भी जाए, किसी भी व्यवसाय में रहे उसके प्रत्येक व्यवहार के साथ जुड़ा रह सकता है। अणुव्रत की चर्चा आम जनता के बीच कहीं भी हो सकती है। अणुव्रत जीवन व्यवहार से जुड़ा हुआ धर्म है यह धर्म स्थान से जुड़ा न होकर कर्म स्थान से जुड़ा हुआ मानो धर्म है। अणुव्रत की बात धर्मस्थानों के बाहर भी हो सकती है। इसके लिए आदमी के भीतर प्राणियों के प्रति दया की भावना हो, किसी भी जीव की अनावश्यक हिंसा का प्रयास नहीं करना चाहिए। प्रत्येक प्राणी मात्र के प्रति दया की भावना हो। आदमी को औचित्य का लंघन नहीं करना चाहिए। जहां तक संभव हो सके दूसरों के प्रति हित की भावना होनी चाहिए। आदमी को लक्ष्मी (धन) आदि का किसी भी प्रकार का अहंकार नहीं करना चाहिए। ज्ञान होने पर भी मौन रखना, शक्ति होने पर भी क्षमाशीलता रखना साधु और अच्छे व्यक्तियों की संगति करने का प्रयास करना चाहिए। गुरु का आदर करना चाहिए। इस प्रकार अणुव्रत में भी जो छोटे-छोटे नियम हैं उनका पालन करने से आदमी का कल्याण हो सकता है। आचार्य प्रवर ने साध्वी कुंदन रेखा जो अभी दिल्ली में है और साध्वी आनंद प्रभा जो अभी हिसार में प्रवासित है, आज उनके दीक्षा पर्याय के 50 वर्षों की परिसम्पन्नता पर साध्वीद्वय को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। आचार्यश्री ने आगे कहा कि अब मारवाड़ में काफी रहना है। यह भी आचार्यश्री भिक्षु स्वामी से संबद्ध है, यहां के लोगों में धार्मिक भावना बनी रहे। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वी प्रमुखा विश्रुत विभाजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि चार प्रकार के अमृत बतलाए गए हैं उनमें एक मुख्य है साधु का दर्शन।