उत्कृष्ट मंगल धर्म है : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

केलवा। 02 दिसंबर, 2025

उत्कृष्ट मंगल धर्म है : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, शान्तिइत महतपस्वी युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज अपनी घवल सेना के साथ राजनगर से केसवा की ओर मंगल प्रस्थान किया। जन-जन पर आशीस बरसाते हुए आचार्य प्रवर लगभग 15 किमी. का विहार संपन्न कर उस केलवा की धरती पर पधारे जहां तेरापंथ के आघ अनुशास्ता आचार्य श्री भिक्षु ने तेरापंथी आचार्य के रूप में प्रथम चार्तुमास किया था। आचार्य श्री भव्य स्वागत जुलूस के साथ केलवा स्थिर भिक्षु विहार में पधारे।
आचार्य श्री महाश्रमण जी ने केलवा के भव्य ‘महाश्रमण समसरणों में उपस्थित विशालजनमेदिनी को पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि धर्म को उत्कृष्ट मंगल कहा गया है। हमारी दुनिया में स्वयं के लिए भी और दूसरों के लिए भी मंगल कामना की जाती है। मंगल हो इसलिए प्रयास किया जा सकता है जैसे खाद्य पदार्थ लेेने के रूप में, शकुन के रूप में ध्यान देकर, मूहुर्त के संदर्भ में अनुपालन कर मंगल का प्रयास किया जाता है।
आगम में कहा गया है कि उत्कृष्ट मंगल धर्म है। प्रश्न होता है कि कौनसा धर्म उत्कृष्ट मंगल है? शास्त्रकार ने कहा कि अहिंसा धर्म, संयम धर्म, तप धर्म उत्कृष्ट मंगल धर्म है। अंिहंसा और संयम की साधना जो भी करेगा उसका मंगल होगा, तप जो भी तपेगा उसका कल्याण हो सकेगा। अहिंसा धर्म शाश्वत धर्म है, सनातन धर्म है, ध्रुव धर्म है। आदमी यह सोचे कि जैसे मुझे दुःख अप्रिय है, सुख प्रिय है उसी प्रकार अन्यप्राणियों को भी दुःख अप्रिय है, सुख प्रिय है, अतः मैं किसी को व्यर्थ दुःख न पहुंचाऊ। जो व्यवहार स्वयं के लिए प्रतिकूल है, वैसा व्यवहार दूसरों के साथ भी नहीं करना चाहिए। प्राणियों को अपने समान समझना चाहिए किसी भी प्राणी के प्राणों को प्रतिपात नहीं करना चाहिए। अहिंसा धर्म जीवन में है तो शान्ति भी रह सकती है। जहां हिंसा है वहां अशान्ति का वातावरण बन सकता है।
इसी प्रकार संयम की साधना की बहुत महत्त्वपूर्ण है। वाणी का संयम भी रखना चाहिए। जहां तक संभव हो झूठ नहीं बोलें, कटु वचन न बोलें, अनावश्यक नहीं बोलना, यह वाणी का संयम है। मन से भी किसी का अनिष्ट नहीं सोचें, सुमंगल ंिचंतन करना मन का संयम है। शरीर का भी संयम करने का प्रयास हो, अपनी पांचो इनिद्रयों का भी संयम रखना चाहिए। दुरूपयोग नहीं करना चाहिए।
तपस्या करना भी साधना है। इसमें अन्न ग्रहण न करना एक तपस्या है। हालांकि शास्त्राें में अध्ययन-अध्यापन, ध्यान आदि भी धर्म के अंग बताए गए हैं। अच्छे कार्य में परिश्रम करना और शुभ योग में रहना भी तपस्या होती है। इसलिए आदमी को अच्छा पुरूषार्थ करने का प्रयास करना चाहिए। आज हम आचार्य श्री भिक्षु से जुड़े हुए क्षेत्र केलवा में आए हैं। यह मानों परम पूज्य आचार्य श्री भिक्षु की दीक्षास्थाली है। उन्होंने तेरापंथ की दीक्षा केलवा में ली। अंधेरी ओरी में आचार्य श्री भिक्षु न जैन श्वेताम्बर तेरापंथ की दीक्षा लेेने पश्चात् पहला चातुर्मासिक प्रवास यहां किया था, तेरापंथ रूपी घट का निर्माण यहां हुआ था। आचार्य श्री भिक्षु का जन्म त्रिशताब्दी का वर्ष भी मना रहे हैं। भिक्षु चेतना वर्ष के दौरान ही पहले राजनगर और उसके बाद केलवा को प्राप्त हुआ। उनकी परंपरा में दस आचार्य प्राप्त हो चुके। केलवा में गुरुदेव तुलसी भी पधारे थे और आज हमारा आना हो गया है।
आचार्य प्रवर के स्वागत में संयोजक श्री महेन्द्र कोठारी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। केलवा के समस्त तेरापंथ समाज ने सामुहिक रूप में गीत का संगान किया। केलवा सर्व समाज द्वारा आचार्य श्री का नागरिक अभिनंदन किया गया और सर्वसमाज ने नागरिक अभिनंदनण्म श्री चरणों में अर्पित किया। आचार्य श्री ने मंगल आशीज प्रदान किया। केलवा ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने भावपूर्ण प्रस्तुति दी। ज्ञानशाला-प्रशिक्षिकाओं ने गीत प्रस्तुत किया।