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आचार्य श्री तुलसी के 112वें जन्म दिवस पर विविध आयोजन
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के नवम आचार्य, आचार्य श्री तुलसी एक ऐसे संत थे जो दूरदृष्टा, क्रांति के प्रवर्तक, करुणा के सागर और संस्कृति के शिल्पी थे। उन्होंने कई अनमोल ग्रंथो की रचना की, साथ ही अर्हत वंदना, अणुव्रत गीत से नई पहचान दिला तेरापंथ को शिखर तक पहुंचाया। उन्होंने जो गीत लिखें उन्हें ज़ब गाते तो आत्मा को छू जाते। आज उनके दुवारा लिखित तेरापंथ प्रबोध तेरापंथ की पहचान बन गया। उनके सामने कई अवरोध आये परन्तु उनकी त्याग तपस्या के सामने टीक नहीं पाए, ऐसे महा मनीषी थे।
उन्होंने साधना को समाज-सुधार से जोड़ा और अणुव्रत आंदोलन के माध्यम से न केवल तेरापंथ धर्मसंघ को, बल्कि समस्त मानवता को नैतिकता, संयम और अहिंसा का सार्वभौमिक संदेश दिया। आचार्य तुलसी ने धर्म को केवल पूजा या अनुष्ठान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जीवन-साधना और सामाजिक चेतना का माध्यम बनाया। उन्होंने हजारों किलोमीटर की पदयात्रा कर हर वर्ग के व्यक्ति से संवाद किया — गरीब की झोपड़ी से लेकर राष्ट्रपति भवन तक उनके विचारों का प्रभाव पहुँचा। वे सामाजिक क्रांति के नायक थे — जिनके मार्गदर्शन से समाज में बाल विवाह, पर्दा प्रथा, मृत्युभोज और दहेज जैसी कुप्रथाओं पर अंकुश लगा। उन्होंने नारी शिक्षा का दीप प्रज्वलित किया, जिसकी आभा आज हर क्षेत्र में झलकती है। आज महिलाएँ डॉक्टर, प्रशासक, पुलिस अधिकारी, सैनिक और अंतरिक्ष यात्री बनकर समाज का गौरव बढ़ा रही हैं — यह सब आचार्य श्री तुलसी की दूरदृष्टि और प्रेरणा का परिणाम है। आज सरकारें भी उनके विचारों को अपनाकर जन-जन को प्रेरित कर रही हैं, ताकि देश विकसित और नैतिक मूल्यों पर आधारित बन सके। उनका चिंतन — महिला सशक्तिकरण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक समरसता जैसे विषयों पर — आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके जीवनकाल में था। आत्ममंथन का समय — क्या हम नई कुरूतियाँ गढ़ रहे हैं? आज जब हम आचार्य तुलसी के जन्मोत्सव को अणुव्रत दिवस के रूप में मना रहे हैं, तो यह आत्मचिंतन का अवसर भी है। गुरुदेव तुलसी ने हमें जिन कुरूतियों और रूढ़िवाद से मुक्त कराया, क्या हम आज नई विकृतियाँ तो नहीं गढ़ रहे? प्रि-वेडिंग शूट्स, दिखावटी डांस, शादी समारोहों में फिजूलखर्ची और मृत्युभोज के नए रूप — क्या ये सब हमारे संस्कारों और सामाजिक मूल्यों को कमजोर नहीं कर रहे? कुछ स्थानों पर इनका परिणाम संबंधों में तनाव और समाज की छवि पर धब्बे के रूप में देखा जा रहा है। गुरुदेव आचार्य श्री तुलसी हमें भले ही भौतिक रूप से छोड़कर चले गए हों, पर उनका पाथेय और मार्गदर्शन आज भी हमारे साथ है। आइए, हम उनके आदर्शों की पुनः स्थापना करें — संस्कार, सादगी और संयम की भावना को फिर से जीवंत करें। उनके दिए अवदानों और अणुव्रत के संदेशों के अनुरूप अपने समाज को संस्कारयुक्त, सशक्त और सहिष्णु बनाएं — तभी उनका जन्मोत्सव मनाना वास्तव में सार्थक होगा।