धर्म है उत्कृष्ट मंगल

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाश्रमण

धर्म है उत्कृष्ट मंगल

कहीं-कहीं कन्याएं खड़ी होकर एक साथ संकल्प करती कि हम दहेज के लोभी भिखारियों के साथ शादी नहीं करेंगी। जो दहेज की याचना करते हैं, वे याचक हैं; भिखारी हैं। हम जीवन भर अविवाहित रह जाएंगी पर याचकों को अपना जीवन साथी नहीं बनाएंगी। इस तरह विविध उपहारों से उपहृत होती हुई मेवाड़ की यह धर्म-यात्रा प्रवर्धमान थी।
स्वाध्याय का महत्त्व
'बेमाली' नामक छोटा-सा ग्राम। ब्रह्ममुहूर्त का नीरव वातावरण। परमाराध्य आचार्य प्रवर अपने अनुष्ठान में संलग्न थे। पास में ही कुछ संत बैठे थे। उनमें से दो बाल-संत सह स्वाध्याय कर रहे थे। शिशु संतों की स्वर लहरी गुरुदेव की कर्णातिथि बनी। थोड़ी ही देर बाद अर्हत्-वंदना का समय हो गया। सारे मुनिजन गुरुदेव की सन्निधि में आसीन हो गए। आचार्यवर ने स्वाध्याय की प्रेरणा देते हुए कहा- प्रातःकाल स्वाध्याय के शब्द कम सुनाई देते हैं। स्वाध्याय को बढ़ावा मिलना चाहिए। ध्यान और जप की भांति स्वाध्याय भी एक सशक्त साधन है, अन्तः शुद्धि का। इस सन्दर्भ में गुरुवर ने एक गाथा का उल्लेख किया जो दशवैकालिक सूत्र की हृदयस्पर्शी गाथाओं में से एक है-
सज्झायसज्झाणरयस्स ताइणो।
अपावभावस्स तवे रयस्स।।
विसुज्झई जसि मलं पुरेकडं।
समीरियं रुप्पमलं व जोइणा।।
स्वाध्याय और सदुध्यान में संलग्न, षट्काय जीवों के रक्षक, पवित्र मावधारा से परिवृत तथा तपोरत साधक का पुराकृत मल उसी प्रकार साफ हो जाता है जैसे अग्नि से प्रेरित स्वर्ण का मल।
आगमों में निर्जरा के बारह प्रकार बतलाए गए हैं। उनमें स्वाध्याय का दसवां स्थान है। यह एक महत्त्वपूर्ण ही नहीं, अपितु साधक के लिए अवश्यकरणीय अनुष्ठान है।
वृहत्कल्प भाष्य में स्वाध्याय की महिमा बताते हुए कहा गया है-
बारसविहम्मि वि तवे,
सब्भिंतर बाहिरे कुसलदिट्ठे।
नय अत्थि नवि अ होही,
सज्झाय समं तवोकम्मं।।
सर्वज्ञोपदिष्ट आभ्यान्तर और बाह्य भेदों से युक्त बारह प्रकार के तप में स्वाध्याय के समकक्ष न कोई तपः कर्म है और न भविष्य में होगा।
किसी भी तपोनुष्ठान की आराधना के लिए उसका ज्ञान होना अनिवार्य होता है। ज्ञान प्रप्ति का एकमात्र साधन है- स्वाध्याय। इस दृष्टि से स्वाध्याय को श्रेष्ठ तप माना गया है।
आचार्य प्रवर ने अनेक साधुओं को व्यक्तिशः पूछा और उनके दैनिक स्वाध्याय के बारे में जानकारी प्राप्त की। गुरुवर ने उपस्थित मुनिवृन्द को स्वाध्याय के लिए प्रेरणा प्रदान की।
क्या चाहते हैं युवाओं से गुरुदेव श्री तुलसी
जन्म लेना और मरना एक नियति है। इसमें मनुष्य स्वाधीन नहीं है। हर आदमी जन्मता है और मर जाता है। जन्म और मृत्यु अपने आप में कोई महत्त्वपूर्ण नहीं है। महनीय और गर्हणीय होती है उनके बीच की अवधि, जिसे जीवन कहा जाता है। जिस व्यक्ति का जीवन महानता की निवास-भूमि बन जाता है, उसके जन्म और मृत्यु भी स्मरणीय एवं श्लाघनीय बन जाते हैं।
२० अक्टूबर १९१४ को एक शिशु ने लाडनूं, जिला नागौर में जन्म लिया। ११ वर्ष की लघु वय में वह अध्यात्म-साधना और सन्तता के लिए कृतसंकल्प हो गया। २२ वर्ष की नवयौवन को अवस्था में उसके कन्धों पर एक विशाल धर्मसंघ के नेतृत्व का दायित्व आ गया। उसने सम्प्रदाय के घेरे से बाहर निकल कर अध्यात्म के मुक्त आकाश में परिभ्रमण का सफल प्रयास किया। उसकी निष्पत्ति हुई-असाम्प्रदायिक धर्म के रूप में अणुव्रत आन्दोलन का सूत्रपात, प्रेक्षाध्यान की विधि का आविष्कार, शिक्षा के क्षेत्र को जीवन विज्ञान का अवदान, जैन आगमों का असाम्प्रदायिक सम्पादन, समण श्रेणी का प्रादुर्भाव आदि। खुले आकाश के मुक्त संचरण ने उसको व्यापकता दी, देश-विदेश में उसका नाम चर्चित हुआ-आचार्य तुलसी।