स्वाध्याय
श्रमण महावीर
धर्म की पहली सीढ़ी है- 'सम्यग् दृष्टि का निर्माण और सम्यग्दृष्टि की पहली पहचान है-शान्ति और मैत्री के मानस का निर्माण। जिसके मन में प्राणीमात्र के प्रति मैत्री की अनुभूति नहीं है, वह महावीर की दृष्टि में धार्मिक नहीं है। चण्डप्रद्योत ने महावीर के इस सूत्र का उपयोग कर अपने को बंदीगृह से मुक्त करवाया था।
चण्डप्रद्योत सिन्धु-सौवीर के अधिपति उद्रायण की रूपसी दासी का अपहरण कर उसे उज्जयिनी ले आया। पता चलने पर उद्रायण ने उज्जयिनी पर आक्रमण कर दिया। चण्डप्रद्योत पराजित हो गया। उद्रायण ने उसे बंदी बना सिन्धु-सौवीर की ओर प्रस्थान कर दिया। मार्ग में भारी वर्षा हुई। उद्रायण ने दसपुर में पड़ाव किया। वहां सांवत्सरिक पर्व आया। उद्रायण ने वार्षिक सिंहावलोकन कर चण्डप्रद्योत से कहा- 'इस महान् पर्व के अवसर पर मैं आपको क्षमा करता हूं। आप मुझे क्षमा करें।' चण्डप्रद्योत ने कहा- 'क्षमा करना और बंदी बनाए रखना ये दोनों एक साथ कैसे हो सकते हैं? आप बंदी से क्षमा करने की आशा कैसे करते हैं? भगवान् महावीर ने मैत्री के मुक्त क्षेत्र का निरूपण किया है। उसमें न बंदी बनने का अवकाश है और न बंदी बनाने का। फिर महाराज! आप किस भाव से मुझे क्षमा करते हैं, और मुझसे क्षमा चाहते हैं?'
उद्रायण को अपने प्रमाद का अनुभव हुआ। उसने चण्डप्रद्योत को मुक्त कर मैत्री के बंधन से बांध लिया। दोनों परम मित्र बन गए।
भगवान् ने अनाक्रमण के दो आयाम प्रस्तुत किए-आन्तरिक और बाहरी। उसका आन्तरिक आयाम था-मैत्री का विकास और बाहरी आयाम था- निःशस्त्रीकरण। निशस्त्रीकरण की आधार-भित्तियां तीन थीं,
१. शस्त्रों का अव्यापार ।
२. शस्त्रों का अवितरण ।
३. शस्त्रों का अल्पीकरण ।
आक्रमण के पीछे आकांक्षा या आवेश के भाव होते हैं। वे मनुष्य को मनुष्य का शत्रु बनाते हैं। शत्रुता का भाव जैसे ही हृदय पर अपना प्रभुत्व स्थापित करता है, वैसे ही भीतर बह रहा प्रेम का स्रोत सुख जाता है। मन सिकुड़ जाता है। बुद्धि रूखी-रूखी सी हो जाती है। मनुष्य क्रूर और दमनकारी बन जाता है। यह हमारी दुनिया की बहुत पुरानी बीमारी है। इसकी चिकित्सा का एकमात्र विकल्प है-समत्व की अनुभूति का विकास, मैत्री की भावना का विकास। इस चिकित्सा के महान् प्रयोक्ता थे भगवान् महावीर। उनका अनाक्रमण का सिद्धान्त आज भी मानव की मृदु और संयत भावनाओं का प्रतिनिधित्व कर रहा है।
10. असंग्रह का आन्दोलन
शरीर और भूख-दोनों एक साथ चलते हैं। इसलिए प्रत्येक शरीरधारी जीव भूख को शांत करने के लिए कुछ न कुछ ग्रहण करता है। बहुत सारे अल्प-विकसित जीव भूख लगने पर भोजन की खोज में निकलते हैं और कुछ मिल जाने पर खा-पी सन्तुष्ट हो जाते हैं। वे संग्रह नहीं करते। कुछ जीव थोड़ा-बहुत संग्रह करते हैं। मनुष्य सर्वाधिक विकसित जीव है। उसमें अतीत की स्मृति और भविष्य की स्पष्ट कल्पना है। इसलिए वह सबसे अधिक संग्रह करता है।
मनुष्य जब अरण्यवासी था तब केवल खाने के लिए सीमित संग्रह करता था। जब वह समाजवादी हो गया तब संग्रह के दो आयाम खुल गए एक आवश्यकता और दूसरा बड़प्पन।
आवश्यकता को पूरा करना सबके लिए जरूरी है। उसमें किसी को कैसे आपत्ति हो सकती है? बड़प्पन में बहुतों को आपत्ति होती है और वह विभिन्न युगों में विभिन्न रूपों में होती रही है।
महावीर के युग में लोग भूखे नहीं थे और आर्थिक समानता का दृष्टिकोण भी निर्मित नहीं हुआ था। लोग भूखे नहीं थे और भाग्यवाद की पकड़ बहुत मजबूत थी, इसलिए अर्थ-संग्रह करने वालों के प्रति आक्रोशपूर्ण मानस का निर्माण नहीं हुआ था।