स्वाध्याय
संबोधि
तप का यथार्थरूप
तप क्या है? तप अग्नि है। अग्नि का स्वभाव है जलाना, ऊपर उठना और आकाश में व्याप्त हो जाना। तप का काम भी यही है। वह भीतर जो विजातीय तत्त्व एकत्रित हो गया है, उसे जला डालता है। मल-आवरण के जल जाने पर चेतना का ऊर्ध्वारोहण होता है और अन्त में साधक अपने चिदाकाश में समाहित हो जाता है। जीवनीशक्ति प्रतिक्षण दूसरों में उत्सुक होकर बाहर बह रही है, उसे रोकने की कला तप है। तप किया और चेतना का अतिक्रमण नहीं हुआ, वह स्वयं को पाने उत्सुक नहीं हुई तो समझना चाहिए कि तप का प्रयोजन सफल नहीं हुआ। आचार्य हेमचन्द्र ने उस उपवास को लंघन कहा है जिसमें कषाय (क्रोध, अहंकार, माया, कपट और लोभ) तथा इन्द्रिय-विषय का त्याग न कर केवल आहार का त्याग किया जाता है। भोजन को छोड़कर चेतना को ऊपर उठाना है, उसे सब तरफ से समेट कर अस्तित्व की दिशा में प्रवाहित करना है। ऊर्जा का स्रोत बाहर जाने से बन्द होगा तब एक नया उत्ताप पैदा होगा। वही ताप अशुद्धि को जलाकर एक नई शक्ति से जीवन की भरेगा। महावीर का वास्तविक तप यही है। वे चाहते हैं कि ऊर्जा अपने भीतर ठहर जाये। इसीलिए उन्होंने यह प्रक्रिया दी। तप शब्द से, भले ही कोई घबराये, किन्तु सब धर्मों में यह स्वीकृत है। सारे धर्म इस बात में एक है कि चेतना बाहर प्रवाहित न हो। चेतनां का अंतर्मुखी जो प्रवाह है वह तप है। इसे स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं आ सकती, इसलिए प्रत्यक्ष और परीक्षरूप से 'तपोयोग' में सभी धर्म सहमत है।
तप का विवेक
महर्षि पतञ्जलि ने कहा है- 'तप से शरीर और इन्द्रियों की अशुद्धि क्षीण होनें से देह और इन्द्रियों की सिद्धि उत्पन्न होती है।' गीता में श्रीकृष्ण ने मन, वाणी और काया के तपों का स्पष्ट दिग्दर्शन कराया है। पूज्य व्यक्तियों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा 'शरीर' तप है। किसी को उद्विग्न न करने वाले सत्य, प्रिय और हितकर वचन बोलना, आध्यात्मिक शास्त्रों का अध्ययन करना वाक्मय तप है। चित को सदा प्रसन्न रखना, सौम्य, मौन और आत्म-निग्रह करना 'मानस' तप है।' भूख-प्यास आदि पर उपवास-व्रत द्वारा विजय प्राप्त कर शरीर को साधना के अनुकूल बनाना तप है। इस प्रकार तप की अस्वीकृति का दर्शन कहीं नहीं है। तप का भयावह चित्र या निरादर जो सामने आया है, वह अविवेक के कारण आया है। तप के साथ विवेक रहता है तो निःसन्देह तप श्रद्धेय और समाचरणीय बनता है। बुद्ध ने तप की अति का वर्जन किया है, तप का नहीं। गीता में 'युक्ताहारविहारस्य' कह कर सर्वत्र विवेक का स्वर प्रकटित किया है। महावीर को भी तप अतिप्रिय नहीं था। उन्होंने स्पष्ट किया है- 'प्रत्येक कार्य में साधक सबसे पहले अपने शरीर बल, मनोबल, श्रद्धा, आरोग्य, क्षेत्र और काल-समय का यथोचित परिज्ञान कर फिर स्वयं को तप में नियोजित करें।' तप के साथ अगर इतना गहरा जागरण होता तो वह क्रमशः अनेक ग्रंथियों का उद्घाटन करता और अध्यात्मिक दिशा में एक नया कीर्तिमान स्थापित करता।