आत्मोदय के उत्प्रेरक : आचार्य श्री भिक्षु

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मुनि मदन कुमार

आत्मोदय के उत्प्रेरक : आचार्य श्री भिक्षु

भगवान महावीर की परंपरा को समृद्ध और सशक्त बनाने वाले आचार्यों की श्रृंखला में आचार्य श्री भिक्षु का नाम अत्यन्त गौरवपूर्ण है। वे अध्यात्म, आचार निष्ठा और अनुशासन के जीवन्त रूप थे। उनकी तपस्या और साधना ने तेरापंथ धर्मसंघ को जन्म दिया। जोधपुर के एक सेवक कवि ने उनके धर्म समुदाय को तेरापंथ की संज्ञा दी और आचार्य श्री भिक्षु ने इस संबोधन को अभिनव अर्थ दिया-हे प्रभो ! यह तेरापंथ। मानव-मानव का यह पंथ।
आचार्य श्री भिक्षु का जन्म राजस्थान के पाली जिले के कंटालिया ग्राम में हुआ था। पिता बल्लूशाह और माता दीपाजी ये। बचपन में ही उनकी बुद्धि और प्रतिभा विलक्षण थी। वे गृहस्थ जीवन में और मुनि जीवन में सत्य के खोजी बनकर रहे। सत्य उनका सर्वोच्च गुरु तथा भगवान महावीर उनके उत्कृष्ट प्रेरणा स्रोत थे। मन में गहन चिन्तन और मंथन किया कि यदि हमारे जीवन में आगम-विरुद्ध श्रद्धा और आचार रहा तो गृह-त्याग और अभिनिष्क्रमण का क्या अर्थ निकलेगा? सभी पहलुओं पर चिन्तन कर उन्होंने धर्म क्रान्ति का बिगुल बजा दिया।
जीवन भीषण कठिनाइयों और संघर्षों का केन्द्र बन गया। पहली कठिनाई प्रवास की आयी। उनका प्रथम प्रवास श्मशान में हुआ जहाँ व्यक्ति का अन्तिम प्रवास होता है। किन्तु कष्टों में भी चित्त की समाधि और लक्ष्य के प्रति समर्पण कभी खंडित नहीं हुआ। किसी व्यक्ति ने पूछा-आपका यह संयत और कठोर मार्ग कब तक चलेगा ? आचार्य श्री भिक्षु ने कहा कि जब तक इस धर्मसंघ के साधु-साध्वी श्रद्धा, आचार और अनुशासन में सुदृढ़ रहेंगे, साधु की मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करेंगे तथा क्षेत्र और श्रावकों के मोहपाश में नहीं फंसेंगे, तब तक यह मार्ग चलेगा। आचार्य श्री भिक्षु ने सदैव गुणवत्ता को कायम रखा तथा आचार और अनुशासन से हीन साधु-साध्वी को कभी नहीं बख्शा। धर्म क्रान्ति के समय वे तेरह साधु थे, जिनमें से केवल छह साधु जीवन पर्यन्त बने रहे। छत्तीस वर्ष तक पुनः तेरह साधु नहीं बने । वे शुद्ध श्रद्धा और साधना के हामी थे। वे कुशल कवि, साहित्यकार और प्रवचनकार थे। प्रज्ञा के आलोक से उनकी लेखनी चलती थी। आचार्य श्री भिक्षु का समस्त साहित्य राजस्थानी भाषा की लगभग सौ कृतियों में गुंफित 38000 पद्य परिमाण जितना है।
आचार्य श्री भिक्षु ने कहा कि हर व्यक्ति को धर्म और आत्म शोधन का अधिकार है। यदि सब जीवों को आत्म विशोधि का अधिकार न हो तो पतित जीवों का आत्मोदय कैसे होगा ? उन्होंने संप्रदाय मुक्त धर्म की परिभाषा देकर धार्मिक जगत पर असीम उपकार किया। उन्होंने कहा कि त्याग धर्म और भोग अधर्म, संयम धर्म और असंयम अधर्म, व्रत धर्म और अव्रत अधर्म है। इनके इस विशुद्ध और असांप्रदायिक विचार के प्रति सुधी और तत्त्व जिज्ञासु जनता का अनायास आकर्षण बढ़ा। अणुव्रत अनुशास्ता श्री तुलसी के शब्दों में- 'आचार्य श्री भिक्षु ने घोर कष्टों में भी सत्य को नहीं छोड़ा।'
आचार्य श्री भिक्षु ने सभी छोटे-बड़े जीवों के प्रति समानता की बात कही। उन्होंने किसी भी स्तर पर हिंसा को मान्यता नहीं दी, बल्कि धर्म के क्षेत्र में चल रही हिंसा का घोर विरोध किया। आचार्य श्री महाप्रज्ञ के अनुसार आचार्य श्री भिक्षु के शब्द कोष में तीन ही शब्द थे-आत्मा, महावीर और जिन-आज्ञा। उनकी प्रत्येक बात में सबसे पहले आत्मा की ध्वनि है। आत्मा के दो पर्याय हैं-महावीर और जिन-आज्ञा। जो व्यक्ति इन तीनों में रमण करता है, वह आत्मकेन्द्रित हो जाता है। जिन आज्ञा के प्रति अटूट श्रद्धा आचार्य श्री भिक्षु का सर्वोच्च गुण था। आचार्य श्री भिक्षु के व्यापक चिन्तन को उजागर करते हुये आचार्य श्री महाप्रज्ञ लिखा है- 'जो व्यक्ति आध्यात्मिक होता है, वह दूसरों को मुक्त करना चाहता है। आचार्य श्री भिक्षु ने कभी किसी को बांधा नहीं। उन्होंने मुक्तता दी, स्वतंत्रता दी और विवेक को जगाया।' आचार्य श्री भिक्षु के व्यवस्था कौशल को उद्योतित करते हुये आचार्य श्री विद्यानन्दजी ने कहा कि आचार्य श्री भिक्षु ने तेरापंथ धर्मसंघ को जो व्यवस्थाएं और मर्यादाएं दीं, उनकी आज भी वही उपयोगिता और प्रयोजनीयता है।