तुलसीयानी, कामायनी से भी मधुर

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डॉ. समणी मंजु प्रज्ञा, समणी स्वर्णप्रज्ञा

तुलसीयानी, कामायनी से भी मधुर

(तुलसी : प्रकृति के दिव्य स्वरूप मे)
स्व.जयशंकर प्रसाद ने कामायनी लिखकर महाकाव्य साहित्य को परिपुष्ट किया है। कामायनी मनु और ईड़ा की संघर्ष की कहानी है। संघर्षों से मिली हुई निष्पत्तियां कामायनी की सुन्दर कहानी है। आचार्य तुलसी का जीवन काव्य कामायनी की पवित्राओं से भी सुन्दर है। हमने कामायनी के तर्ज पर तुलसीयानी बनाकर यह प्रस्तुत किया है कि तुलसी का जीवन प्रकृति का सुन्दर रूप था।
प्रथम सर्ग :
सूर्य में तुलसी उषा की लालिमा में जब सूर्य उदित होता,
तब तुलसी के तेज का स्मरण दिलाता।
रश्मियों के सुनहरे जाल में बंधकर,
जगत को प्रकाशित करता निरंतर।
वैसे ही आचार्य तुलसी का तेज अपराजित,
अज्ञान के तिमिर को करता पराजित।
सप्तरंगी किरणों की भांति सप्त शिक्षा,
जीवन में भरती अमृत की दीक्षा।
जैसे सूर्य अस्त होकर भी नहीं मरता,
पूर्व में फिर नए तेज से उभरता।
वैसे ही तुलसी की कीर्ति अमर,
युगों-युगों तक चमकेगी निरंतर।
द्वितीय सर्ग:
चंद्रमा में तुलसी रजनी की रानी चंद्रमा जब आता,
शीतल किरणों से जग को नहलाता।
अमृत की धाराओं से सींचकर,
मन की तृष्णा को शांत करके।
षोडशकला से युक्त चंद्र का रूप,
षोडश संस्कारों से संपन्न तुलसी का स्वरूप।
कला-कला में छुपा है एक गुण निराला,
संस्कार-संस्कार में जीवन की मधुशाला।
अमावस्या में चांद जब छुप जाता,
फिर पूर्णिमा में पूरा दिखाता।
वैसे ही तुलसी गुप्त रूप में साधना करते,
प्रकट होकर जग का कल्याण करते।
तृतीय सर्ग :
पृथ्वी में तुलसी तुलसी की महानता भी धरती सी,
सबको गले लगाने वाली आरती सी।
जाति, धर्म, ऊंच-नीच का भेद नहीं,
सबके लिए खुला था हृदय, कोई छेद नहीं।
जैसे धरती बीज को अंकुरित करती,
वैसे ही तुलसी विचारों को फलित करती।
एक बीज से हजारों वृक्ष उगाकर,
वन बनाती जाती निरंतर।
गुरुत्वाकर्षण से धरती सबको बांधे रखती,
तुलसी भी प्रेम से सबको संस्कारित रखती।
चतुर्थ सर्ग :
समुद्र में तुलसी अगाध, अथाह, अपार महासागर,
लहरों का नृत्य करता निरंतर।
मोती छुपाए गहरे तल में,
रत्न बिखेरे जल की कल में।
तुलसी का व्यक्तित्व भी सागर सा गंभीर,
ज्ञान की गहराई में छुपे अधीर।
सतह पर दिखती मधुर मुस्कान,
भीतर छुपा अनंत का ज्ञान।
ज्वार-भाटा आता रहता समुद्र में,
सुख-दु:ख आते रहे तुलसी के जीवन में।
पर अडिग, अचल, शांत रहकर,
सबको दे देते थे प्रेम से भरकर।
पंचम सर्ग :
वायु में तुलसी तुलसी की शिक्षा भी वायु सी निर्मल,
जाति-पांति के बंधनों से विमल।
गरीब-अमीर, राजा-प्रजा के लिए समान,
सबको मिले आत्मा का ज्ञान।
हवा में घुली सुगंध की तरह,
फैले उनके विचार हर राह।
दिशा-विदिशा में पहुंचे संदेश,
हर कोने में फैला उपदेश।
तूफान में भी वायु नहीं रुकती,
बाधाओं से कभी नहीं झुकती।
वैसे ही तुलसी का संकल्प अटूट,
विरोधों में भी रहा अछूत।
षष्ठम सर्ग:
सुगंध में तुलसी फूलों की सुगंध हवा में घुल जाती,
दूर-दूर तक अपनी पहचान बनाती।
बिना किसी भेदभाव के सभी को मिलती,
मन में आनंद की तरंगें भरती।
तुलसी के गुणों की सुगंध भी ऐसी,
फैली चारों ओर मधुर सांस्कारिक रसी।
स्पर्श करती सबके हृदय को,
पवित्र बनाती जीवन की राह को।
चंदन, गुलाब, मोगरा, बेला की महक,
सबसे मधुर उनके चरित्र की दहक।
सप्तम सर्ग:
सर्वस्वरूप तुलसी सूर्य का तेज, चंद्र की शीतलता,
धरती का धैर्य, सागर की गंभीरता।
वायु की निर्मलता, आंधी का वेग,
सुगंध की मधुरता - सब कुछ एक साथ।
तुलसी में समाए थे सभी तत्व,
प्रकृति के कण-कण में बसे वे सत्व।
आकाश सा विशाल उनका हृदय,
अग्नि सा प्रज्वलित था संकल्प निश्चय।
जल सी निर्मलता, वायु सा प्रवाह,
पृथ्वी सा धैर्य था उनके पास।
परमात्मा से जुड़ाव था निरंतर,
इसलिए थे वे दिव्य, अलौकिक, सुंदर।
अष्टम:
कामायनी की गूंज जैसे कामायनी में श्रद्धा और मनु,
संघर्ष करते हैं जीवन के अणु।
आशा, चिंता, लज्जा के भावों से,
निकलते हैं नए जीवन के आवों से।
तुलसी के जीवन में भी था यही संघर्ष,
व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन का प्रयास।
कभी श्रद्धा बनकर दिखाया प्रेम,
कभी मनु बनकर दिखाया धर्म।
जैसे कामायनी का अंत आनंद में,
वैसे ही उनका जीवन था मोक्ष के छंद में।
प्रसाद जी की लेखनी जैसी मधुर,
तुलसी का व्यक्तित्व था वैसा ही सुंदर।
छायावाद की भांति कोमल भावना,
प्रगतिवाद सी क्रांतिकारी कामना।
नवम सर्ग :
महाकाव्य की परिणति सूर्य, चंद्र,
धरती, सागर, वायु, आंधी, सुगंध,
सभी में दिखे तुलसी के दिव्य गुणों का बंध।
यह कामायनी नहीं, तुलसायनी है यह काव्य,
जहां हर शब्द में छुपा है दिव्य भाव्य।
श्रद्धा हो या मनु, आशा हो या चिंता,
सब में तुलसी की झलक मिलती चिंता।
आनंद में लीन यह महाकाव्य समाप्त हो,
पर तुलसी की कीर्ति सभी में व्याप्त हो।
दशम सर्ग:
प्रकृति में तुलसी को ढूंढना।
सूर्य देखो तो उनका तेज दिखेगा,
चांद देखो तो उनका प्रेम दिखेगा।
धरती को छुओ तो उनका धैर्य मिलेगा,
समुद्र को देखो तो उनका ज्ञान मिलेगा।
हवा में सांस लो तो उनकी निर्मलता,
फूलों की खुशबू में उनकी सरलता।
यह कामायनी नहीं, प्रकृति का महाकाव्य,
जहां तुलसी के गुण हैं सर्वत्र दृश्य।
यह तुलसायनी, कामायनी से भी मधुर,
प्रकृति और पुरुष का मिलन सुंदर।
जय तुलसी! जय प्रकृति के पुत्र!
तुम्हारी कीर्ति है अमर सूत्र।