गुरुवाणी/ केन्द्र
हमारा मार्ग प्रशस्त कर रहा है भिक्षु साहित्य : आचार्यश्री महाश्रमण
भिक्षु चेतना वर्ष के महाचरण के आठवें दिवस का कार्यक्रम का शांतिदूत, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ प्रारंभ हुआ। सर्वप्रथम साध्वी मैत्रीयशाजी व साध्वी ख्यातयशाजी ने गीत का संगान किया। आज के निर्धारित विषय ‘‘आचार्य भिक्षु की साहित्य संपदा’’ पर मुनि नमन कुमार जी ने अपनी अभिव्यक्ति दी।
अखण्ड परिव्राजक आचार्य श्री महाश्रमण जी ने अपनी पावन देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि धर्म के तीन आयाम हैं - अहिंसा, संयम और तप। तीसरे आयाम तप के बारह प्रकार उपलब्ध होते हैं उनमें दसवां प्रकार है - ‘स्वाध्याय’। स्वाध्याय पांच रूपों में हो सकता है - वाचना, पृच्छना, परिवर्तना, अनुप्रेक्षा व धर्मकथा। इससे यह अनुमान किया जा सकता है कि धर्मकथा या प्रवचन देने से पूर्व वाचना, पृच्छना, परिवर्तना, अनुप्रेक्षा या चिंतन-मनन का होना आवश्यक होता है। एक अर्हता आने के बाद धर्मकथा होती है तो वह प्रभावशाली भी हो सकती है। अच्छी तैयारी और चिंतन-मनन के बाद यदि धर्मकथा की जाती है तो उस धर्मकथा में जीवंतता आ सकती है। स्वाध्याय में साहित्य भी सहायक बनता है। साहित्य के दो रूप हो सकते हैं एक गुरु परंपरा से चला आ रहा अप्रकाशित साहित्य और दूसरा लिखित रूप अर्थात् प्रकाशित साहित्य। एक समय था जब हमारे आगम लिखित रूप में नहीं थे परन्तु बाद में इन्हें लिपिबद्ध करने की व्यवस्था हुई। आज यदि हमारे पास लिपिबद्ध आगम साहित्य नहीं होता तो अध्ययन करने और ज्ञान प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती थी।
आगम साहित्य का अपना गरिमापूर्ण स्थान है। हमारे धर्मसंघ की चारित्रात्माओं द्वारा कितने ग्रन्थों की लिपियां तैयार की गई होंगी। वर्तमान में जैन विश्व भारती साहित्य प्रकाशन की अधिकृत संस्था है। आज कितनी किताबें जैन विश्व भारती के द्वारा प्रकाशित होती है। साहित्य हाथ में आता है तो पढ़ने वाले लोगों का ज्ञान भी विकसित हो सकता है। वह भी समय रहा होगा, जब बिना किताबों के ज्ञान का प्रसार होता था।
हमारे धर्मसंघ में अतीत में हुए दस आचार्यों में चार आचार्य - आचार्य श्री भिक्षु, श्रीमद् जयाचार्य, आचार्य श्री तुलसी और आचार्य श्री महाप्रज्ञ साहित्य के क्षेत्र में विशेष योगदान देने वाले रहे हैं। आचार्य श्री भिक्षु की अनेक संपदाओं में एक साहित्य संपदा को भी देख सकते हैं। ज्ञानावरणीय कर्म का विशेष क्षयोपशम होने पर ही साहित्य का सृजन होता है। आचार्य भिक्षु के साहित्य में तात्विक बोलों और आख्यानों का पद्यात्मक रूप साहित्य प्राप्त होता है। आचार्य भिक्षु ने जो साहित्य संपदा प्रदान की है वे हमारे तेरापंथ धर्मसंघ के आधारभूत ग्रन्थ हैं। इतनी प्रचुर मात्रा में साहित्य सृजन करने की उनमें अद्भुत क्षमता थी। उनके ज्ञानावरणीय कर्म का कितना क्षयोपशम रहा होगा?
स्वामीजी का साहित्य और फिर बाद में प्रज्ञा पुरूष श्रीमज्जयाचार्य ने जो साहित्य की रचना की वह बहुत बड़ी बात है। उन्होंने तो पद्यात्मक रूप में राजस्थानी भाषा में साहित्य का सृजन किया। हमें तत्त्वज्ञान, तेरापंथ दर्शन, आदि के माध्यम से ज्ञानार्जन का निरंतर प्रयास करना चाहिए। आचार्य भिक्षु की साहित्य संपदा आज भी हमारे पास उपलब्ध है, जो हमारा मार्ग प्रशस्त कर रही है। आचार्य श्री ने साधु-साध्वियों व समणियों की अनेक जिज्ञासाओं को सामाहित किया। 'शासन गौरव' साध्वी राजीमती जी द्वारा रचित ‘आत्म विशोधि पथ’ पुस्तक को जैन विश्व भारती की ओर से आचार्य श्री के समक्ष लोकार्पित किया गया।
आचार्य श्री ने इस संदर्भ में प्रेरणा प्रदान की। साध्वी सम्यक् प्रभा जी ने अपनी प्रस्तुति देते हुए सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया। अनिता डागा ने गीत की प्रस्तुति दी। तेरापंथ महिला मंडल-कंटालिया ने भी गीत की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम में बभान-झांझड़िया स्कूल के छात्र-छात्राओं की विशेष उपस्थिति रही, विद्यालय के प्राध्यापक महेन्द्र सिंह रावत ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।
आचार्य प्रवर ने उपस्थित विद्यार्थियों को प्रेरणा प्रदान करते हुए सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की प्रतिज्ञा करवाई। कार्यक्रम का कुशल संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।