तेरापंथ की सुषमा और शोभा का आधार है मजबूत नींव : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

कंटालिया। 20 दिसंबर, 2025

तेरापंथ की सुषमा और शोभा का आधार है मजबूत नींव : आचार्यश्री महाश्रमण

आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के महाचरण के छठे दिवस के कार्यक्रम का शुभारंभ वर्तमान अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ ‘भिक्षु समवसरण’ कंटालिया में हुआ। साध्वी शारदाश्रीजी आदि साध्वियों ने गीत का संगान किया। आज के निर्धारित विषय ‘आचार्य भिक्षु और तेरापंथ की स्थापना’ विषय पर मुनि योगेश कुमारजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी।
तदुपरान्त जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता महातपस्वी युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को मंगल संबोध प्रदान करते हुए फरमाया कि धर्म वह तत्त्व है जो व्यक्ति को दुर्गति से बचा सकता है
और शुभ स्थान में स्थापित कर सकता है। धर्म परम मंगल तत्त्व होता है। देव भी ऐसे व्यक्ति को नमन करते हैं जिसका मन धर्म में रमा हुआ होता है। धर्म ऐसा तत्त्व है जो व्यक्ति को पूजनीय बना देता है।
आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष और भिक्षु चेतना वर्ष चल रहा है और महाचरण की आयोजना प्रवर्द्धमान है। तेरापंथ की स्थापना आचार्य भिक्षु की ‘नव्य भव्य दीक्षा’ ग्रहण करने के साथ हुई, नये सिरे से साधुपन लेने के रूप में हुई। प्रश्न हो सकता है कि उन्होंने नए सिरे से साधुपन क्यों लिया? इसका उत्तर यह है कि उन्होंने यह माना कि पूर्व अवस्था में शुद्ध साधुपन था ही नहीं, इसीलिए नए सिरे से ‘नव्य भव्य दीक्षा’ स्वीकार करनी पड़ी। तेरापंथ की स्थापना केलवा में हुई परन्तु इसके साथ ही एक चिन्तन यह भी है कि अन्यत्र प्रवासित साधुओं ने भी संभवतः उसी दिन नव्य भव्य दीक्षा ली थी अतः उसको भी तेरापंथ की स्थापना के साथ जोड़ा जा सकता है।
तेरापंथ की नींव या स्थापना के छः पिलर (स्तम्भ) थे जिनमें एक मुख्य स्वामीजी और अन्य पांच संत थे। स्वामीजी में तो मनोबल था ही परन्तु उन कठिन परिस्थितियों में उन पांच संतों का स्वामीजी के साथ रहना भी कितना साहसिक कार्य रहा। अतः तेरापंथ की स्थापना में इनका भी योगदान कम नहीं माना जा सकता। व्यक्ति रूप में ये स्तंभ हैं पर व्यक्ति हमेशा नहीं रहता पर सिद्धान्त, प्रारूप, ढांचा लम्बे काल तक रहता है।
हमारे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की सुषमा, शोभा व मजबूती है उसमें कुछ नींव के पत्थर हैं जिनके आधार पर आज भी तेरापंथ का ढांचा काफी व्यवस्थित है। इनमें एक महत्त्वपूर्ण नींव का पत्थर है, आचार्य भिक्षु द्वारा एक आचार्य की परंपरा की नींव रखना कि 'सर्व साधु-साध्वी एक आचार्य की आज्ञा में रहें।' यह परम्परा दस दशकों के पूर्ण होने तथा दूसरे दशक के प्रारंभ होने अर्थात् आज तक चली आ रही है। एक आचार्य की व्यवस्था, तेरापंथ की एकता, अक्षुण्णता और व्यवस्थितता में अपना एक योगदान है। भावी आचार्य का निर्णय करने का अधिकार वर्तमान आचार्य का ही होता है, इससे भी संघ की एकता में सहयोग मिलता है। साधु-साध्वियों का विहार, चातुर्मास कहाँ होगा, इसका निर्णय भी आचार्य ही करते हैं, इससे श्रावक समाज भी एकजुट रहता है क्योंकि श्रावक समाज अलग-अलग संतों या साध्वियों के साथ एकदम जुड़ जाए यह संभावना भी कम है क्योंकि अंतिम निर्णय आचार्य का ही होता है।
अगली बात है कि दीक्षा योग्य व्यक्ति को ही दी जाती है, मात्र संख्या बढ़ाने के लिए नहीं। संघ से अलग हो जाने वाले को प्रश्रय नहीं देना भी एकजुटता का सूत्र है। यह मर्यादा-व्यवस्थाएं आज भी सुचारू रूप से संचालित है। एक नेतृत्व के होने से एकता का सूत्र मानो कितना सुदृढ़ है। यह नियति का ही योग है कि संघ की सारी मर्यादाएं अच्छे ढंग से चल रही है। तेरापंथ धर्मसंघ में सेवा केन्द्रों आदि की व्यवस्था भी कितनी सुदृढ़ता प्रदान करने वाली है। हम सभी साधु-साध्वियां अपनी साधना को आगे बढ़ाते हए अपने धर्म संघ की सुषमा को जितना बढ़ा सकें, बढ़ाने का प्रयास करें, यह काम्य है।
आचार्य प्रवर ने आज भी साधु-साध्वियों, समणियों को जिज्ञासाएं प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया एवं उन्हें समाहित किया।
मुनि अजितकुमारजी ने आचार्यश्री से अठाई की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। साध्वी काव्यलताजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी और सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया।
अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष पवन माण्डोत ने अपनी अभिव्यक्ति में 54 दिवसीय अखण्ड जप तथा आचार्यश्री की मार्ग सेवा में सत्कार ऑन व्हील बस के संदर्भ में जानकारी दी। तेरापंथ महिला मंडल चेन्नई की अध्यक्षा सुमन मरलेचा ने गीत की प्रस्तुति दी। तारा मरलेचा और कविता सेठिया ने अपनी अभिव्यक्ति दी।
कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।