गुरुवाणी/ केन्द्र
वह शिष्य उपलब्धिमान है जिस पर गुरु विश्वास करते हैं : आचार्यश्री महाश्रमण
आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के महाचरण के चतुर्थ दिवस के कार्यक्रम का शुभारंभ तेरापंथ धर्म संघ के एकादशमाधिशास्ता, शांतिदूत, महातपस्वी, आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। कार्यक्रम के प्रारंभ में मुनि ध्रुवकुमारजी ने गीत का संगान किया। तत्पश्चात् निर्धारित विषय - 'आचार्य भिक्षु का गृहत्याग जीवन' पर मुनि दिनेश कुमारजी ने अपनी विचाराभिव्यक्ति दी।
युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि धर्म साधना में क्षमता के संदर्भ में धर्म के दो विभाग हो जाते हैं - अगार धर्म और अणगार धर्म। घर में रहते हुए धर्म की साधना करना अगार धर्म है और गृहत्याग करके धर्म की आराधना करना अणगार धर्म है।
श्रावक साधना करता है, बारह व्रती बन जाता है वह अगार धर्म की साधना है और जब व्यक्ति घर से अभिनिष्क्रमण कर दे और सर्व सावद्य त्याग रूप साधुत्व स्वीकार कर ले वह गृहत्याग रूप में धर्म की आराधना का क्रम हो जाता है।
आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के संदर्भ में गृहत्याग जीवन से यहां हम तेरापंथ की स्थापना से पूर्व का गृहत्याग रूप जीवन को विवक्षित कर सकते हैं। गृहस्थ जीवन में भी आचार्य भिक्षु का त्याग और साधना का क्रम रहा, फिर उन्होंने गृहत्याग कर दिया और जैन शासन के एक आम्नाय में वे दीक्षित हो गए। कुछ वर्षों का उनका जो गृहत्याग के जीवन का काल रहा उसमें अपने गुरु का विश्वासपात्र बन जाना एक उपलब्धि मानी जा सकती है। शिष्य अनेक हो सकते हैं परन्तु सारे शिष्य एक समान हों यह आवश्यक नहीं है। वह शिष्य उपलब्धिमान है जिस पर गुरु विश्वास करते हैं और आश्वस्त हो जाते हैं। ऐसे शिष्य जो कुछ ही समय में गुरु के लिए आलम्बन बन जाते हैं, उनकी विशेष प्रतिभा हो सकती है। गुरु के प्रति उनकी निष्ठा होती है और गुरु की उनके प्रति निष्ठा होती है। निष्ठा दोनों तरफ से हो सकती है। आचार्य भिक्षु अपने गुरु के लिए आश्वासनभूत बन गए। राजनगर की घटना के संदर्भ में आचार्य भिक्षु अपने गुरु का आलम्बन बने।
आचार्य भिक्षु ने गृहत्याग जीवन में अपने गुरु की निश्रा में शास्त्रों का स्वाध्याय किया। आचार्य भिक्षु के स्वाध्याय में उनकी बौद्धिकता, चिंतन की तीक्ष्णता, तर्कशीलता का होना विशेष बात है। स्वाध्याय में, ज्ञानार्जन में तर्क पैदा होना, प्रश्न उठना स्वाध्याय का एक विभूषण होता है। आचार्य भिक्षु के गृहत्याग जीवन के काल में उनके जैसी प्रतिभा और प्रज्ञा हर किसी में हो यह आवश्यक नहीं है।
आचार्य भिक्षु के गृहत्याग जीवन के कुछ वर्षों में वे अपने गुरु के संभावित उत्तराधिकारी के रूप में माने जाने लगे थे, यह भी उनकी विशेष उपलब्धि थी। उससे भी बड़ी उपलब्धि यह थी कि इतनी ऊंची संभावना को प्राप्त करने के बाद भी उनका क्रान्ति का निर्णय कर लेना एक बड़ी बात है।
आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ में हाजरी के क्रम को संपादित करते हुए चारित्रात्माओं को अनेक प्रेरणाएं प्रदान की। आचार्यश्री की प्रेरणा और अनुज्ञा से सभी साधु-साध्वियां व समणियां पंक्तिबद्ध हुए तो मानों मर्यादा महोत्सव जैसा दृश्य कंटालिया में उपस्थित हो गया। सभी चारित्रात्माओं ने लेखपत्र का उच्चारण किया। आचार्यश्री के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने 'हमारे भाग्य बड़े बलवान' गीत का आंशिक संगान किया। राजुल कांकरिया ने गीत की प्रस्तुति दी। प्रकाश गादिया ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।