गुरुवाणी/ केन्द्र
आचार और विचार की शु़द्धता के लिए स्वामीजी ने की महा धर्म क्रान्ति : आचार्यश्री महाश्रमण
आचार्य श्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के महाचरण का आज पांचवां दिवस। चतुर्विध धर्मसंघ की विशाल उपस्थिति में आचार्य श्री महाश्रमण जी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ आज के कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। मुनि नम्र कुमार जी ने गीत का संगान किया। आज के निर्धारित विषय - ‘‘आचार्य भिक्षु की धर्म क्रान्ति’’ पर मुनि कुमारश्रमण जी ने अपनी अभिव्यक्ति दी।
तदुपरान्त युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने पावन देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि धर्म की अतिसंक्षेप व्याख्या है - अहिंसा धर्म है, संयम धर्म है, और तप धर्म है। धर्म अपने आप में बहुत शुद्ध तत्त्व है। धर्म जब शुद्ध है तो उसमें क्रान्ति की अपेक्षा भी कहां होती है? आज के दिन का विषय निर्धारित है - ‘‘आचार्य भिक्षु की धर्मक्रान्ति’’। धर्म के संदर्भ में क्रान्ति वहां अपेक्षित होती है, कि जो धर्म के अनुयायी लोग हैं, उन्होंने जो धर्म स्वीकार किया है, उसका पालन सही रूप में हो रहा है या नहीं? जहां धर्म का पालन सहीं ढंग से नहीं होता, वहां क्रान्ति की अपेक्षा हो सकती है। धर्म की व्याख्या और आचार के संदर्भ में धर्म क्रान्ति की जा सकती है। आचार्य भिक्षु के द्वारा जो धर्म क्रान्ति की गई वह धर्म की व्याख्या और आचार के संदर्भ में की गई।
दो शब्द हैं - शांति और क्रान्ति। शांति अर्थात् कषायों का उपशमन। शांति बहुत अच्छी चीज है, परन्तु कभी-कभी शांति में क्रान्ति भी अपेक्षित हो सकती है। क्रान्ति करने से कोई लाभ लग रहा हो तो क्रान्ति भी अपेक्षित हो सकती है। क्रान्ति करने से कोई लाभ लग रहा हो तो क्रान्ति करें अन्यथा अनावश्यक संघर्ष में नहीं जाना चाहिए। तेरापंथ में मान्यता और आधार के संदर्भ में जो धर्मक्रान्ति हुई है, उसमें किसी अंश में राजनगर के श्रावकों का भी योगदान है। पहली क्रान्ति राजनगर के श्रावकों द्वारा ही की गई। स्वामी जी ने तो बाद में क्रान्ति की। अतः पृष्ठभूमि में राजनगर के श्रावकों द्वारा की गई क्रान्ति ही है। क्रान्ति का उद्देश्य सही हो तो किसी कार्य में पुनः निर्मलता आ सकती है। क्रान्ति करने वाले में कठिनाईयों को झेलने का माद्दा, संघर्षों को झेलने की ताकत हो तभी क्रान्ति सफलता को प्राप्त हो सकती है। आचार्य भिक्षु में साहस और मनोबल था। स्वामीजी गुरु के आंसुओं को देखकर द्रवित नहीं हुए और किसी से भी नहीं डरे, इन दोनों परिस्थितियों में स्वामीजी मजबूती से अपने मार्ग पर डटे रहे। आचार्य श्री भिक्षु की भावी उत्तराधिकारी की संभावना थी और ऐसी अनुकूलता की स्थिति का परित्याग कर, समुदाय, संघ को छोड़ देना एक क्रान्ति ही नहीं महाक्रान्ति है। आचार्य भिक्षु की क्रान्ति में त्याग बोलता है। आचार और विचार की शु़द्धता को ध्यान में रखते हुए की गई क्रान्ति कल्याणकारी हो सकती है।
आचार्य प्रवर ने मंगल प्रवचन के उपरान्त साधु-साध्वियों और समणियों की जिज्ञासाओं को समाहित किया।
गुरुदर्शन करने के उपरान्त साध्वी कुन्दनप्रभा जी ने अपनी सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया और अपनी भावाभिव्यक्ति दी। मुनि चैतन्य कुमार जी ने भी अपनी भावनाएं अभिव्यक्ति की। मुनि सिद्धप्रज्ञ जी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। नवरत्नमल गादिया व लता कांकरिया ने अपनी अभिव्यक्ति दी। हितेश मरलेचा ने गीत की प्रस्तुति दी। राजस्थान शिक्षक संघ ‘आजाद’ जिला शाखा पाली के जिलाध्यक्ष घनश्याम सेन ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। आचार्य प्रवर ने सभी को मंगल आर्शीवाद प्रदान किया।
कार्यक्रम का कुशल संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।