समस्याओं के समाधायक थे आचार्य श्री भिक्षु : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

कंटालिया। 16 दिसंबर, 2025

समस्याओं के समाधायक थे आचार्य श्री भिक्षु : आचार्यश्री महाश्रमण

तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता आचार्य श्री भिक्षु की जन्म स्थली कंटालिया में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के प्रवास का द्वितीय दिवस। भव्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के महाचरण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। सर्वप्रथम मुनि कीर्तिकुमार जी व मुनि अर्हम् कुमार जी ने गीत की प्रस्तुति दी। मुख्यमुनि श्री महावीर कुमार जी ने ‘‘आचार्य भिक्षु का शैशवकाल’’ विषय पर विशद अभिव्यक्ति देते हुए कहा कि कंटालिया की इस धरती से ऐसा महासूर्य उद्घाटित हुआ था जिसने पूरे जगत में ऐसा प्रकाश फैलाया, जो प्रकाश आज भी लोगों के मिथ्यात्व और अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करने में समर्थ है।
महातपस्वी युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि धर्म व्यक्ति के जीवन में होता है तो परम को प्राप्त कराने वाली चीज व्यक्ति के पास होती है। व्यक्ति का शैशवकाल भी होता है परन्तु जन्मों से भी संबद्ध हो सकते हैं, शिशु-शिशु में भी अंतर हो सकता है। इस शैशव काल का बढ़िया उपयोग किया जाना चाहिए। बच्चा थोड़ा बड़ा हो जाए तो उसे अच्छे संस्कार दिए जा सकते हैं और संस्कार देने का प्रयास तो गर्भावस्था से ही किया जा सकता है।
अभी हम कंटालिया में हैं। आचार्य श्री भिक्षु की जन्म-स्थली का गौरव कंटालिया को प्राप्त हो। अभी आचार्य श्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष चल रहा है। इस वर्ष के दौरान कंटालिया में हमारा आना हो गया है। हमने आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी की भी जन्मशताब्दी मनाई थी, लेकिन टमकोर आना नहीं हो पाया था, परन्तु आचार्य श्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के दौरान कंटालिया में आना हो गया है। आचार्य भिक्षु शैशवकाल में ही समस्याओं का समाधान निकालने वाले थे। उनकी बुद्धि विलक्षण थी। ऐसा प्रतीत होता है कि ज्ञान का उनमें विशेष क्षयोपशम था। शैशव काल प्रत्येक व्यक्ति का आता है परन्तु विशेष बात यह है कि शैशव काल का विशेष लाभ उठाने का प्रयास होना चाहिए। आचार्य श्री तुलसी अपने जीवन के बारहवें वर्ष में, आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी जीवन के ग्यारहवें वर्ष में साधु बन गए थे। साध्वी गुलाबसती की तो जीवन के आठवें बरस में ही दीक्षा हो गई थी। तेरापंथ धर्मसंघ के आज तक के इतिहास में साध्वी गुलाब सती की दीक्षा सबसे कम आयु में हुई थी। शैशवावस्था में ज्ञानार्जन का प्रयास होना चाहिए। जिन साधु-साध्वियों, समणियों का शैशवकाल अथवा थोड़ी अधिक अवस्था चल रही है, उनको इस काल के सदुपयोग करने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री के जयेष्ठ भ्राता स्व. सुजानमल जी दूगड़ के देहावसान के संदर्भ में स्मृति सभा का आयोजन हुआ। इस संदर्भ में सर्वप्रथम आचार्य प्रवर ने कहा कि शास्त्र में शरीर को अनित्य कहा गया है और इसका नाश होता ही है। सुजानमल जी दूगड़ का देहावसान हो गया। वे हमारे संसारपक्षीय परिवार में सबसे बड़े थे। आचार्यश्री ने उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना की।
मुख्यमुनिश्री महावीर कुमार जी, साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभाजी, साध्वीवर्या श्री संबुद्धयशा जी, स्व. सुजानमल जी की संसारपक्षीय पुत्री साध्वी सुमतिप्रभा जी, साध्वी चारित्रयशा जी, मुनि कुमारश्रमण जी, मुनि कीर्तिकुमार जी, मुनि विश्रतुकुमार जी, मुनि योगेशकुमार जी ने उनकी आत्मा के ऊर्ध्वारोहण की आध्यात्मिक मंगलकामना की। दूगड़ परिवार की ओर से सूरजकरण दूगड़, श्रीचंद दूगड़, महेन्द्र दूगड़, नितेश, धीरज, मधु, सुमति चंद गोठी, गौतम जे. सेठिया, रूपचन्द दूगड़ ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्य प्रवर ने दूगड़ पारिवारिकजनों को आध्यात्मिक संबल प्रदान किया।