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आचार्य श्री तुलसी के १०० वें दीक्षा दिवस पर विविध आयोजन
आचार्य श्री महाश्रमण जी विदुषी सुशीष्य डॉ. साध्वी परमयशा जी के सान्निध्य में '' एक विराट व्यक्तित्व आचार्य श्री तुलसी का 100 वा दीक्षा दिवस '' का समायोजन हुआ। डॉ. साध्वी परमयशा जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि 'जिंदगी दरिया नहीं। जो लहरों में खो जाए। जिंदगी ख्वाब नहीं। जो सपनों में खो जाए। जिंदगी का मकसद है नर से नारायण बनना। जिंदगी दर्पण नहीं जो चेहरे में खो जाए। मंजिल उसे मिली है जो कांटों पे चल सके पैदा कर यह कमाल की दुनिया बदल सके।' YOU CAN WIN IN LIFE* यह आदर्श वाक्य आचार्य श्री तुलसी के आस-पास गुजता था। उन्होंने जो सोचा वो किया। वे एक कीर्तिमान पुरुष थे, उन्हें होसलो के साथ कीर्तिमानों की झड़ी लगा दी। वो कीर्तिमान चाहे अणुव्रत हो या प्रेक्षाध्यान, जीवन विज्ञान हो या जैन विश्व भारती।
आचार्य श्री तुलसी की यह खासियत थी कि वे हमेशा वर्तमान में रहते थे। साध्वी मुक्ताप्रभाजी ने नौवें अधिसास्ता के हृदय कमल, चरण कमल, कंठ कमल, हस्त कमल आदि के बारे में विस्तार से बताया। साध्वी कुमुदप्रभाजी ने कीर्तिमान पुरुष के आहार–संयम, वाणी संयम, जप साधना, अप्रमाणिकता के विभिन्न प्रयोगों के बारे में बताया। कार्यक्रम में तेरापंथ सभा अध्यक्ष श्रीमान सुशील कोठारी, महिला मंडल की अध्यक्ष उषा पुगलिया आदि ने भावांजलि अर्पित की। साध्वी विनम्रयशा जी ने कार्यक्रम का कुशल संचालन किया।