स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
कर्मणा जैन
सन् 1961 बगड़ी मर्यादा महोत्सव के सुअवसर पर आचार्यवर ने कर्मणा जैन अभियान प्रारम्भ किया था। आचार्यवर का चिन्तन है कि जैन धर्म जन धर्म बने, केवल ओसवाल, अग्रवाल कोम तक ही वह सीमित न रहे। जन्मना जैन तो व्यक्ति अनायास ही बन जाता है। किन्तु कर्मणा जैन व्यक्ति समझ और संकल्प के साथ बनता है। कर्मणा जैन बनने के लिए आवश्यक है-
lनमस्कार महामन्त्र का स्मरण।
lव्यसन-मुक्त जीवन ।
lनिरपराध प्राणी की हत्या का परिवर्जन ।
lगुरु (पथदर्शक) के प्रति आस्था आदि।
प्रत्येक युवक अपने सम्प में आने वाले पांच व्यक्तियों को भी कर्मणा जैन बनाए तो बहुत बड़ा काम हो सकता है। उनका जीवन उन्नत हो सकता है।
प्रेक्षाध्यान
प्रेक्षाध्यान एक ध्यान (Meditation) की विधि है। उसमें अध्यात्म और विज्ञान दोनों का समन्वय है, लोगों की धारणा हो सकती है कि ध्यान योग साधु-संन्यासियों की साधना का विषय है, जनसाधारण का उससे क्या वास्ता है यह बात सही है। कि साधु-संन्यासियों का जीवन तो साधना के लिए सर्वात्मना समर्पित होना ही चाहिए। पर आधा घन्टा ध्यान का अभ्यास आधुनिक तनावपूर्ण जीवन जीने वाले व्यक्तियों के लिए भी अपेक्षित है। स्नान से शारीरिक शुद्धि होती है। मानसिक, भावनात्मक मल की शुद्धि के लिए ध्यान-साधना भी धर्म का स्नान है। प्रेक्षाध्यान का समुचित प्रशिक्षण पाने के लिए एक दस दिवसीय प्रेक्षाध्यान शिविर में भाग लेना बहुत अपेक्षित है। कम से कम एक बार प्रत्येक युवक को शिविर एटेण्ड करना चाहिए। उसके बाद दूसरी स्थिति है प्रेक्षा-प्रशिक्षण की। कुछ युवक ऐसे भी हों जो स्वयं ध्यान के अभ्यासी होने के साथ-साथ औरों को भी ध्यान करा सकें। प्रेक्षाध्यान के सैद्धान्तिक और प्रायोगिक दोनों पक्षो को उनको मौलिक जानकारो हो। प्रज्ञा पर्वं समारोह के प्रशिक्षण-कार्यक्रम के अन्तर्गत एक यह भी उपक्रम था-प्रेक्षा-प्रशिक्षक तैयार करना। साधु-साध्वियों के अतिरिक्त स्नातक वर्ग के युवा वृन्द ने भी उसका प्रशिक्षण प्राप्त किया था। और भी कुछ युवाओं को इस दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए।
समण दीक्षा
साधु और गृहस्थ के बीच की कड़ी है समण दीक्षा। उसमें व्यक्ति गृहस्थ जीवन तथा मुनि-जीवन की कठोर चर्या दोनों से मुक्त होता है। उसमें आध्यात्मिक विकास के लिए भी अवकाश है तथा धर्म के प्रचार-प्रसार का भी मुक्त अवसर साधक को मिल सकता है। मुनि जीवन किसी के लिए कठिन भी हो सकता है। यावज्जीवन के लिए समण दीक्षा भी सबके लिए संभव नहीं हो सकती है पर सावधिक (१ वर्ष, २ वर्ष के लिए) समण दीक्षा बहुत कठिन नहीं है। कुछ युवकों ने सावधिक समण दीक्षा का जीवन जीकर अनुभव भी प्राप्त किया है। गुरुदेवश्ची चाहते हैं प्रबुद्ध युवकों की टीम-जो सावधिक समण दीक्षा स्वीकार कर त्याग और अध्यात्म के जीवन का रसास्वादन करें एवं अपनी बौद्धिक क्षमता का भी अच्छा उपयोग करें।
पुरुषार्थ
आचार्य उमास्वाति ने तत्वार्थ सूत्र लिखा। उसकी पीठिका का एक श्लोक है
श्रममविचिन्त्यात्मगतं तस्माच्छेयः सदोपदेष्टव्यम्।
आत्मानञ्च परञ्च हि हितोपदेष्टा नु गण्हाति।।
श्रम की परवाह किये विना व्यक्ति को हितोपदेश में लगा रहना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति अपना और पराया दोनों का कल्याण करता है। पूज्य श्री तुलसी ने, स्वयं पुरुषार्थ और साहस का जीवन जीया है। वे हर एक युवक में भी पुरुषार्थ की लौ को जलते हुए देखना चाहते हैं। उनके शब्दों में वह युवक युवक नहीं जो अकर्मण्यता और आलस्य का जीवन जीये।
गुरुदेव श्री तुलसी के इन स्वप्नों को साकार करने के लिए प्रत्येक युवक को चिन्तन एवं मनन
करना चाहिए।