स्वाध्याय
संबोधि
आभ्यन्तर को छोड़कर केवल बाहर को पकड़ने के कारण धर्म की सरिता सूख गयी। उसका कोई स्वाद नहीं रहा। जीवन मुर्दे जैसा हो गया। सर्वत्र वीरान ही वीरान दृष्टिगत होता है। ऐसा लगता है, मनुष्य की महान् शक्ति किसी ने छीन ली हो। वह रस रहित गन्ने के छिलकों की तरह हो रहा है। प्रेम, करुणा, शांति, सरलता, सहजता आदि सद्गुणों के शुष्क स्रोतों को पुनः प्रवाहित करने का एक उपाय है कि बाहर के लगाव से मानव को मुक्त कर अन्दर के प्रति प्रोत्साहित, आकृष्ट और निष्ठावान् किया जाये। इसी में धर्म की जीवन्तता चेतनता है। धर्म को बचाने का एक मात्र यही उपाय है। बाह्य तप आभ्यन्तर के लिए है। आभ्यन्तर के बिना बाह्य तप की सार्थकता भी क्या है? आचार्य शुभचन्द्र ने कहा है-
'मनः शुद्धचैव शुद्धिः स्याद्, देहिनां नात्र संशयः।
वृथा तद्व्यतिरेकेण, कायस्यैव क़दर्थनम्।।
'इसमें कोई संशय नहीं है कि मनुष्यों की शुद्धि, पवित्रता मानसिक शुद्धि से ही होती है। मानसिक पवित्रता के बिना केवल शरीर को कदर्थित करना बुद्धिमानी नहीं है।'
बाह्य तप के प्रकार
(१) अनशन
व्यवहार भाष्य में लिखा है- 'साधक! सिर्फ स्थूल शरीर को क्यों कृश-कमजोर कर रहा है? कमजोर करना है तो सूक्ष्म शरीर-कार्मण शरीर, कषाय (क्रोध, अहंकार, माया, लोभ), गौरव (ऋद्धि गौरव, रस गौरव, सुख गौरव) और इन्द्रियों को कर।
महावीर ने कहा है-'जायाए घासमेसेज्जा, रसगिद्धे न सिया भिक्खाए' -साधक रसलोलुप न बने। वह भोजन संयम और चेतना के जागरण के लिए करे। आहार करने का उद्देश्य इससे स्पष्ट होता है। साधक जिस ध्येय के लिए चला है, वह सतत उसकी आंखों के सामने परिदृष्ट रहे। एक क्षण भी ध्येय को विस्मृत न करे। चेतना की विस्मृति अधर्म है और स्मृति धर्म है। चेतना की सुषुप्ति हिंसा है, प्रमाद है, मृत्यु है और उसकी जागृति अहिंसा है, अप्रमाद है, अमृत है। साधक जागृति के लिए जीता है। आहार भी लेता है तो चेतना के जागरण के लिए और छोड़ता है तो भी जागरण के लिए। आहार के छोड़ने से अगर चेतना जागरण में अवरोध होता है तो वह उसे ग्रहण करता है। आहार के ग्रहण और त्याग का सम्पूर्ण विवेक साधक पर निर्भर है। कैसा आहार करना ? कितना करना? कब करना ? कब क्यों नहीं करना ? साधक अगर इन प्रश्नों को उपेक्षित करता है तो वह साधना में सफल नहीं हो सकता। बाह्य तप के कुछ भेद इन्हीं संकेतों को प्रस्तुत करते हैं।
अनशन का अर्थ है- उपवास, आहार आदि का वर्जन। यह उनके लिए है जिन्हें भोजन को छोड़कर भोजन का चिंतन भी नहीं सताता है। यदि व्यक्ति भोजन की चिंता से व्याकुल होते हैं और ध्यान पेट की तरफ चला जाता है तब उपवास सार्थक नहीं होता।