रचनाएं
पारदर्शिता हो तो कैसी! भिक्षु जैसी
आचार्य श्री भिक्षु तेरापंथ के आदि प्रणेता थे। वे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। उनका तपस्वी ज्ञान प्रेरणादायी था। महामना की पारदर्शिता ने तेरापंथ के नीलम्बर में उनका तलस्पर्शी ज्ञान जन जन के लिए चार चाँद लगा दिए। उनकी सूक्ष्म दर्शिता काबिले तारीफ थी। सदियों सहस्त्राब्दियों बाद ऐसे महामानव धरा पर आते हैं।
जिण तिण नै मत मूंडज्यो
दीक्षा परीक्षा समीक्षा अन्वीक्षा के साथ का प्राणवान हो - यह आचार्य श्री भिक्षु के शासन की चिरंजीविता पहलू है। कंटालिया के भाई ने कहा- स्वामी! मेरी दीक्षा लेने की भावना है। माँ के प्रति मेरा मोह है। जब तक माँ जीवित है तब तक मैं दीक्षा नहीं ले सकता। कुछ समय के बाद उसकी माँ दिवंगत हो गयी। एकदा स्वामीजी ने पूछा-तुम्हारी दीक्षा की भावना थी अब क्या विचार है क्योंकि माँ तो दुनिया से अलविदा हो गयी। वह भाई बोला- स्वामीनाथ! और दुविधा आ गई। मैं पहाड़ी गाँवों में व्यापार करता हूँ। वहाँ 'मेरे लोग रहते है। कुछ मेरेणियों से मेरा मोह हो गया। कुछ ठहर कर दीक्षा लेने का भाव है। स्वामीजी ने पैनीनिगाहों से कहा- माँ तो एक थी पर मेरेणिया तो अनेक है। कब वे मेरणियां मरेगी? कब तू दीक्षा लेगा ऐसे कायर कमजोर दुर्बल मनोबल वाले दीक्षा के काबिल नहीं हो सकते। इन्हीं भावों को गीत में गुंफित किया है आचार्य श्री तुलसी ने-
तू कद दीक्षा लेसी जब तक जीवै मेरणयां मगरे री
दुलहिन रोवै न्याय दुल्हों रोवै कुणसी दुविधा हेरी
सुण्या बात संजम री ताव चढ़े तब दीक्षा में देरी
एक मर्या दोन्यों नै लेणी पड़सी अनशन री सेरी
इण विध कर कर कड़ी कसौटी - चुपकै खिंची सब री चोटी
ज्यू त्यूँ मूंडणो बाबै नै जहर खारो लागै
दीक्षा के संदर्भ में ऐसे अनेक दृष्टांत भिक्षु स्वामी की महामेधा के परिचायक है। क्योंकि दीक्षा कायरों का नहीं - वीरों का मार्ग है।
कार्तिक के ज्योतिषी श्री भिक्षु-
एक व्यक्ति स्वामीजी के पास आया। उसने पूछा, आप बड़े आलोचक हैं। शिथिलाचार पर आपने प्रहार किए हैं। आपने यह कैसे जाना कि अमुक व्यक्ति शिथिलाचारी है मैं जानना चाहता हूँ। स्वामीजी ने कहा-हम कार्तिक के ज्योतिषी है आषाढ़ के नहीं। आषाढ़ में अन्न की उपज तथा भाव बताए जाते है वे केवल भविष्यवाणी होते है। वे भाव सही हो भी सकते है नहीं भी हो सकते है। किन्तु कार्तिक मास में जो भाव बताए जाते है वे भविष्य के न होकर वर्तमान वर्ती होते है। ऐसे मैने शिथिलाचार के संदर्भ में जो लिखा है वे सब तथ्य वर्तमान अनुभव के आधार पर है उसमें कल्पना का समावेश नहीं है। सत्य समर्पित साधक भीख स्वामी सत्य के परम भक्त थे।
सत्य ही भगवान है। उन्होंने इस आर्ष वाक्य को हृदयंगम किया था। वे आग्रही नहीं, सत्याग्रही थे। उनका मस्तिष्क सत्य संयम समता के तटबंधों से आलोकित था।
असाधारण महानायक श्री भिक्षु-
एक व्यक्ति ने कहा- स्वामीजी! कुछ लोग एकत्रित हो रहे है और आपके अवगुण निकाल रहे हैं। स्वामीजी ने कहा- अवगुण निकाल ही रहे हैं डाल तो नहीं रहे यह तो अच्छी बात है। मुझे अवगुण निकालने ही हैं। कुछ मैं निकालता हूँ कुछ वे निकालते हैं इस प्रकार मैं शीघ्र ही अवगुणों से मुक्त हो जाऊंगा। सकारात्मक सोच के परमाणु आचार्य भिक्षु के रोम-रोम में भरे थे। नकारात्मकता उनसे कोसों दूर थी।
यही वजह है आचार्य श्री भिक्षु असाधारण महानायक बन गए। उनका आत्मबल मनोबल संकल्पबल अध्यात्म बल बेजोड़ का नालन्दा विश्व विद्यालय के डायरेक्टर डॉ. सतकौडि़ मुखर्जी ने कहा- आचार्य श्री भिक्षु का जन्म मारवाड़ की धरा पर हुआ। यदि उनका जन्म जर्मन में होता तो महान विद्वान कान्ट से भी ज्यादा उनका मूल्य होता। हालांकि आचार्य श्री भिक्षु Knowledge के लिए किसी College में नहीं गए पर उन्होंने 38 हजार पद भाषा के परिमाण साहित्य का सृजन करके राजस्थानी भंडार को समृद्ध बना दिया। अनुकंपा की चौपाई, विनीत अविनीत की चौपाई, श्रद्धा आचार की चौपाई, भिक्षु दृष्टांत, दान दया अनुकंपा आदि ग्रंथ आचार्य श्री मिक्षु की गौरख गाथा गाते हैं। ये ग्रंथ नहीं महाग्रंथ है जिनके हर पैराग्राफ में अध्यात्म की सुगंध है। हर पृष्ठ में ज्ञान का आलोक है। हर पंक्ति में भक्ति की महिमा है। हर शब्द में जीवन वीणा की झंकार है।
त्रि जन्मशताब्दी के पावन प्रसंग पर,
ऊर्जा के अक्षय कोष को प्रणाम
सफलता के प्राणकोश को प्रणाम
सौम्यता के नव उन्मेष को प्रणाम
प्रयोग धर्मा सत्य धर्मा को शत-2 प्रणाम।।