गुरुवाणी/ केन्द्र
लोभ के उभरने पर मनुष्य हो सकता है पाप में प्रवृत्त : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी अपनी धवल सेना के साथ सोजत रोड़ से विहार कर बगड़ी नगर के तेरापंथ भवन में पधारे। मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं को अमृत देशना प्रदान करते हुए शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी ने कहा कि शास्त्रों में कहा गया है कि जैसे-जैसे लाभ होता है, वैसे-वैसे लोभ बढ़ता जाता है। कुछ प्राप्त हो जाने पर मनुष्य सोचता है कि कुछ और मिले, आगे और मिले। लोभ ऐसी वृत्ति है, जिसके उभरने पर मनुष्य अनेक पापों में प्रवृत्त हो सकता है। वृत्ति होने पर ही प्रवृत्ति होती है। मनुष्य हिंसा करता है, तो उसका कारण भीतर वृत्ति का होना है। प्रवृत्ति होने पर फिर उसका परिणाम भी आता है। इस प्रकार वृत्ति, प्रवृत्ति और परिणाम—ये तीनों बातें होती हैं। मूल में वृत्ति होती है, वृत्ति के उभार से होने वाला उपक्रम प्रवृत्ति है और प्रवृत्ति से कोई परिणाम उत्पन्न होता है। परिणाम की पृष्ठभूमि में प्रवृत्ति और प्रवृत्ति की पृष्ठभूमि में वृत्ति होती है।
तत्त्वात्मक भाषा में यदि कोई व्यक्ति हिंसा करता है, तो उसकी पृष्ठभूमि में प्राणातिपात पापस्थान का उदय अथवा राग-द्वेष की वृत्ति होती है, जिसके कारण वह हिंसा में प्रवृत्त होता है। हिंसा करना प्रवृत्ति है और हिंसा करने के कारण जो पापकर्म का बंध होता है, वह उसका परिणाम है। इसी प्रकार लोभ की वृत्ति भी एक वृत्ति है, जिसके कारण मनुष्य धोखाधड़ी करता है और झूठ बोलता है—यह प्रवृत्ति है, और फिर पकड़े जाने पर जो दंड भोगना पड़ता है, वह उसका परिणाम होता है।
आज हम बगड़ी नगर में आए हैं। यहाँ आचार्य श्री तुलसी का मर्यादा महोत्सव हुआ है। यह नगर संत भीखण जी से भी जुड़ा हुआ है, जहाँ से उनके अभिनिष्क्रमण का प्रसंग जुड़ा है। बगड़ी के साथ परम पूज्य आचार्य श्री भिक्षु के संसारपक्षीय जीवन के विवाह का प्रसंग तथा प्रथम दीक्षा ग्रहण करने का प्रसंग भी जुड़ा हुआ है। संघ की दृष्टि से देखें तो अभिनिष्क्रमण का प्रसंग भी बगड़ी से संबंधित है। आचार्य प्रवर ने इस संदर्भ में “प्रभो! तुम्हारे पावन पथ पर…” गीत का आंशिक संगान भी किया।
आचार्य प्रवर के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने उपस्थित श्रद्धालुओं को उद्बोधन देते हुए कहा कि एक आत्मद्रष्टा, आत्मकेंद्रित आराधक महापुरुष, जिन्होंने बगड़ी से अभिनिष्क्रमण किया था और अपना प्रवास ऐसे स्थान को बनाया जहाँ लोग जीवन की अंतिम यात्रा पूर्ण करते हैं। आचार्य भिक्षु साहस और निर्भीकता के साथ अपने आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर हुए। आचार्य भिक्षु ज्ञान-संपन्न थे, उनका व्यक्तित्व आचार-संपन्न और प्रज्ञा-संपन्न था, और इन्हीं गुणों के कारण उन्होंने एक नए मार्ग का निर्माण किया।
तत्पश्चात् बगड़ी से संबद्ध साध्वी सार्थकप्रभा जी एवं साध्वी प्रवीणप्रभा जी ने अपनी श्रद्धासिक्त अभिव्यक्ति दी। तेरापंथी सभा के अध्यक्ष राजेश सुराणा, जैन विश्व भारती के मुख्य न्यासी एवं आज के कार्यक्रम के संयोजक जयन्तीलाल सुराणा ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। महासभा के अध्यक्ष मनसुखलाल सेठिया, सरपंच मूनाराम जी एवं ठाकुर भगवंत सिंह जी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मंडल तथा तेरापंथी सभा से संबद्ध सदस्यों ने पृथक्-पृथक् गीत की प्रस्तुति दी। जैन विश्व भारती की ओर से पूज्य प्रवर के समक्ष ‘आस्था के चमत्कार’ पुस्तक का लोकार्पण किया गया। पूर्व न्यायाधिपति मनोज गर्ग ने अपनी पुस्तक आचार्य श्री के समक्ष लोकार्पित की। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमार जी ने किया।