संतोष और असंतोष का हो विवेक : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

मुसालिया। 28 दिसंबर, 2025

संतोष और असंतोष का हो विवेक : आचार्यश्री महाश्रमण

आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष ‘भिक्षु चेतना वर्ष’ के तेरह दिवसीय महाचरण का आयोजन महामना भिक्षु की जन्मस्थली कंटालिया में सुसंपन्न होने के उपरान्त रविवार को प्रातः जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी अपनी धवल सेना के साथ लगभग सात किमी का विहार कर मुसालिया ग्राम स्थित ओसवाल पंचायत भवन में पधारे। ओसवाल पंचायत भवन में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित श्रद्धालुओं को आर्हत् वाङ्मय के माध्यम से अमृत देशना प्रदान करते हुए युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने फरमाया कि मनुष्य के भीतर अनेक वृत्तियाँ होती हैं। मनुष्य के भीतर क्रोध, अहंकार, माया, लोभ आदि के रूप में वृत्तियाँ विद्यमान रहती हैं। जैन वाङ्मय में दस प्रकार की संज्ञाएँ बताई गई हैं। कई मनुष्य वीतराग अर्थात् अक्रोध, अमान, अमाया, अलोभ बन जाते हैं। सामान्य मनुष्य में क्रोध, अहंकार, माया और लोभ की वृत्ति उदय अथवा उत्तेजित रूप में कम या अधिक हो सकती है, परंतु इन वृत्तियों की सत्ता बनी ही रहती है।
लोभ को पाप का बाप कहा गया है। बहुत से पापों का कारण लोभ ही होता है। मनुष्य के मन में लालसा और कामना उत्पन्न हो जाती है। जब यह कामना भौतिक पदार्थों अथवा भौतिक उपलब्धियों की होती है, तो वह कामना दुःख का कारण भी बन जाती है। मनुष्य के भीतर कामना का शल्य होता है। यदि व्यक्ति की कामना पूर्ण नहीं होती, तो उसके भीतर चुभन बनी रहती है और वह दुःखी हो जाता है। यह कामनाओं का संसार है, इसलिए मनुष्य को अपनी कामनाओं को संतुलित रखना चाहिए। संतोष को धारण करना चाहिए। संतोषी व्यक्ति सदा सुखी रहता है।
पंडित और ज्ञानी व्यक्ति अपने जीवन में संतोष को धारण कर लेता है। संतोष को परम सुख कहा गया है। संतोष और असंतोष कहाँ रखना चाहिए, इसका भी विवेक होना आवश्यक है। एक संस्कृत कवि ने कहा है कि तीन बातों—स्वदार, भोजन और धन में संतोष रखना चाहिए तथा तीन बातों—अध्ययन, जप और दान में संतोष नहीं रखना चाहिए। आचार्य प्रवर ने कहा कि कुछ वर्षों के बाद कंटालिया के पश्चात् मुसालिया आना हुआ है। यहाँ के लोगों में अच्छी धार्मिक भावना बनी रहे। आचार्य प्रवर के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि जिनवाणी सबसे शीतल होती है। जिनवाणी की व्याख्या करने वाले गुरु होते हैं। गुरु की वाणी शिष्य के भीतर शीतलता प्रदान करने वाली होती है। आज परम पूज्य गुरुदेव का यहाँ आगमन हुआ है, जिससे सभी को शांति और शीतलता का अनुभव हो रहा है। अपनी संसार पक्षीय जन्मभूमि में साध्वी सिद्धार्थप्रभा जी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। रमेशचंद बोहरा, उषा बोहरा, अशोक बोहरा, महावीर पिपाड़ा, दर्शन बोहरा, संगीता बोहरा एवं जोधाराम जी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। स्थानीय तेरापंथ महिला मंडल ने गीत का संगान किया। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमार जी ने किया।