औचित्य अनुसार हो वचन शक्ति का प्रयोग : आचार्य श्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

कंटालिया। 26 दिसंबर, 2025

औचित्य अनुसार हो वचन शक्ति का प्रयोग : आचार्य श्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी की सन्निधि में आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष ‘भिक्षु चेतना वर्ष’ के महाचरण के बारहवें दिवस के कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्य प्रवर के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। समणीवृंद ने गीत का संगान किया। आज के निर्धारित विषय “आचार्य भिक्षु की वचन संपदा” पर साध्वी चारित्रयशा जी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी ने समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को अमृत देशना प्रदान करते हुए कहा कि धर्म अहिंसा है, संयम है और तप है। इस धर्म की जानकारी लोगों तक पहुँचाने का एक व्यावहारिक और सक्षम माध्यम वचन है। वचन के द्वारा हम दूसरों को ज्ञान प्रदान करने का प्रयास कर सकते हैं। तीर्थंकर भगवान जनता को प्रतिबोध देने के लिए अपनी वाणी, अपने प्रवचन का प्रयोग करते हैं, जिससे औरों को ज्ञान मिले और लोग संसार-सागर से तरने की दिशा में प्रयत्नशील हो सकें, साधु, साध्वी, श्रावक अथवा श्राविका बनकर अपना उद्धार कर सकें। वचन ऐसा माध्यम है, जिसके द्वारा विचारों का संप्रेषण हो सकता है।
वचन का उपयोग हम चार रूपों में कर सकते हैं। पहला प्रकार है—परिषद में व्याख्यान अथवा प्रवचन देना। दूसरा उपयोग है—बातचीत करना, कोई पूछे तो वार्तालाप के रूप में उसे बताना। तीसरा है—गीत का संगान करने के रूप में वचन का उपयोग। चौथा उपयोग है—मंगल पाठ आदि सुनाने के रूप में वचन का उपयोग। जिनके पास अच्छी वचन शक्ति है, उन्हें औचित्यानुसार अपनी वाणी की शक्ति का उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी प्रवचन करते थे तो उनकी भाषा कितनी अच्छी और शुद्ध होती थी। उनके गीत संगान में भी माधुर्य था। हमारी बातचीत और वाणी से हमें किसी पर भी व्यक्तिगत आक्षेप लगाने से बचना चाहिए। अवगुणात्मक बातों से यथासंभव बचने का प्रयास करना चाहिए। वाणी से कटुतापूर्ण शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। प्रवचन या भाषण देते समय ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए, जिसे सुनने वाला समझ सके। व्याख्यान ऐसा हो, जिसे सुनकर लोगों को अच्छा आध्यात्मिक लाभ प्राप्त हो सके। प्रवचन आदि निर्धारित समय पर प्रारंभ कर उन्हें समय सीमा में ही परिसंपन्न करने का प्रयास करना चाहिए। प्रवचन में नियमितता और समय की पाबंदी हो, तो यह अच्छी बात होती है।
आचार्य भिक्षु की वाणी को हमने साक्षात् नहीं सुना, परंतु उनके दृष्टांत आदि जो साहित्य में देखने को मिलते हैं और उनके जीवन के जो प्रसंग प्राप्त होते हैं, उनसे यह जाना जा सकता है कि उनके वचन में यदि विनोद भी था, तो उसके साथ तात्त्विक गहराई भी थी। उनके पास जो भी आता, वह प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था।
आचार्य भिक्षु की वचन संपदा ऐसी थी कि वे जो भी कहते, लोग उसे सम्मान और श्रद्धा से स्वीकार करते थे। किसी घटना-प्रसंग को वे सरलता से समझा देते थे। हमें भी स्वयं की वचन संपदा पर ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए। हम सभी की वचन संपदा अच्छी रहे, यह काम्य है। आचार्य प्रवर के मंगल प्रवचन के उपरांत मुनि पारस कुमार जी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। ज्ञानशाला प्रशिक्षिका सुनीता सोलंकी ने प्राकृत भाषा में अपनी अभिव्यक्ति दी। राज परिवार की ओर से हिमाद्री कुमारी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। बालिका आरोही और सारा सेठिया ने अपनी बालसुलभ प्रस्तुति दी। मंजू डागा ने अपने परिवार की महिलाओं के साथ गीत का संगान किया। राजश्री डागा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। ज्ञानशाला, कंटालिया के ज्ञानार्थियों ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी तथा प्रशिक्षिकाओं ने गीत का संगान किया। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों को आचार्य प्रवर ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के पूर्व अध्यक्ष रमेश डागा, गौतम डागा, सपना श्रीमाल, अमृत डागा, जबर सिंह ने अपनी अभिव्यक्ति दी। महेन्द्र सिंघी एवं मदनलाल मरलेचा ने पृथक्-पृथक् गीत की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमार जी ने किया।