युक्तिसंगत बात को स्वीकार करने का हो प्रयास : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

कंटालिया। 27 दिसंबर, 2025

युक्तिसंगत बात को स्वीकार करने का हो प्रयास : आचार्यश्री महाश्रमण

आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष ‘भिक्षु चेतना वर्ष’ के महाचरण का तेरहवाँ एवं अंतिम दिवस। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी की मंगल सन्निधि में आज के कार्यक्रम का शुभारम्भ मंगल महामंत्रोच्चार से हुआ। साध्वीवर्या श्री संबुद्धयशा जी ने अन्य साध्वियों के साथ गीत की प्रस्तुति दी, जो भगवान महावीर और आचार्य भिक्षु की समानताओं को निरूपित कर रहा था। आज के लिए निर्धारित विषय “आचार्य भिक्षु की तर्क संपदा” पर साध्वी ऋद्धिप्रभा जी ने अपनी विचाराभिव्यक्ति दी।
महातपस्वी शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी ने पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि धर्म का प्रज्ञापन यदि तार्किकता के साथ किया जाता है, तो वह प्रज्ञापन बौद्धिक जनता के लिए भी स्वीकरणीय बन सकता है। कोई किसी बात को श्रद्धा से स्वीकार करता है, तो कोई उसे बौद्धिकता अर्थात् तर्क से भी स्वीकार करता है। कोई बात हेतुवाद से समझी जा सकती है, तो कोई बात अहेतुगम्य भी होती है। जो बात हेतुवाद से समझी जा सके, उसे हेतु से समझना चाहिए और जो लगभग हेतु-गम्य नहीं है, जैसे आगम में ऐसा है, तो उसे उसी रूप में स्वीकार करना चाहिए।
हम किसी विषय को पढ़ें अथवा समझें, तो उसे तीन प्रश्नों के आधार पर समझना चाहिए—क्या, क्यों और कैसे ? इन तीन प्रश्नों के आधार पर उत्तर खोजने का प्रयास हो, तो कोई उपदेश अथवा निर्देश अच्छी तरह बुद्धिगम्य हो सकता है। तार्किकता के संदर्भ में कुमार श्रमण केशी और राजा प्रदेशी की कथा को देखा जा सकता है। कुमार श्रमण केशी और राजा प्रदेशी का परिसंवाद बौद्धिक तार्किकता का अच्छा उदाहरण है। कुमार श्रमण केशी ने राजा प्रदेशी के तर्कों का खंडन किया और हेतुवाद के आधार पर अपनी बातों को प्रस्तुत किया। अंत में राजा प्रदेशी प्रणत हुए और उन्होंने कुमार श्रमण केशी की बातों को स्वीकार किया। हेतु के माध्यम से बात को समझाने का प्रयास हो, तो किसी को अपनी बात समझाने में आसानी हो सकती है। तर्क के साथ व्यक्ति की निष्ठा भी होनी चाहिए। कोई बात यदि युक्तिसंगत लगे, तो उसे स्वीकार करने का प्रयास करना चाहिए। यथार्थ के साथ रहने का प्रयास करना चाहिए। यदि कोई बात सही लगे, तो उसका खंडन करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। जैन धर्म में अनेकांत है, इसका यह अर्थ नहीं है कि जो कोई भी जो बात कह रहा है, वह भी सत्य है। जो सत्य है, वह सत्य रहेगा और जो असत्य है, वह असत्य ही रहेगा। आचार्य श्री भिक्षु की अपनी विशिष्ट तार्किकता थी। आज कंटालिया प्रवास का तेरहवाँ दिन है। इतने श्रावक-श्राविकाओं, साधु-साध्वियों एवं समणियों की उपस्थिति रही। गायन और वक्तव्यों का क्रम भी चला। आचार्य श्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के अंतर्गत निर्धारित तेरह दिवसीय कार्यक्रम आज पूर्ण हुआ। यह महाचरण ज्ञानवर्धन का निमित्त भी बना। इस अवसर पर आचार्य प्रवर ने महाचरण की सम्पन्नता की घोषणा की।
कार्यक्रम में साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने भी उद्बोधन दिया और आचार्यश्री से साधु-साध्वियों को बख्शीश प्रदान करने की प्रार्थना की। इस पर आचार्य श्री ने प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि वे तो बोलने को भी तप मानते हैं और इस प्रकार यह तपस्या का ही एक क्रम रहा है। श्रावक-श्राविकाओं ने भी इतना सुनने का प्रयास किया। यह महामना भिक्षु स्वामी से जुड़ा हुआ स्थान है। हम सभी निरंतर अच्छा विकास करते रहें। साध्वी अणिमाश्री जी एवं समणी कुसुमप्रज्ञा जी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तेरापंथ समाज, कंटालिया ने सामूहिक रूप से गीत की प्रस्तुति दी।
डॉ. महेन्द्र सिंह राठौड़, महेन्द्र पोरवाल, राजेश मरलेचा, संदीप मूथा, रूपा सुराणा, सारिका मरलेचा, अध्यक्ष गौतम जे. सेठिया, मंत्री संजय मरलेचा एवं मोक्षिता डागा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मंडल, कंटालिया ने गीत का संगान किया। भुज ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी प्रस्तुति दी। बालक समर्थ गादिया ने ‘ग्लोबल चेंजर’ पुस्तक आचार्य श्री के चरणों में समर्पित की। आचार्य श्री ने बालक को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। स्काउट मास्टर चुन्नीलाल चौहान एवं सरपंच पारसमल ने अपनी अभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमार जी ने किया।