सुंदरता से अधिक शरीर की निरामयता का है महत्व : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

कंटालिया। 25 दिसंबर, 2025

सुंदरता से अधिक शरीर की निरामयता का है महत्व : आचार्यश्री महाश्रमण

‘भिक्षु चेतना वर्ष’ के महाचरण के ग्यारहवें दिवस का शुभारंभ युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के मंगल महामंत्रोच्चार से हुआ। समणी वृंद ने गीत की प्रस्तुति दी। “आचार्य भिक्षु की शरीर संपदा” विषय पर साध्वी सुमतिप्रभा जी ने अपनी अभिव्यक्ति दी।
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, शांतिदूत, महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी ने अमृत देशना प्रदान करते हुए कहा कि धर्म एक महान तत्त्व है, उसकी साधना-आराधना में शरीर का भी योग अपेक्षित हो सकता है। एक सूक्त में कहा गया है कि शरीर धर्म का साधन है। धर्म की साधना में सूक्ष्म शरीर, कार्मण शरीर और स्थूल शरीर—तीनों का योगदान होता है। स्थूल शरीर की अनुकूलता होने पर कई घंटों तक स्वाध्याय किया जा सकता है, खड़े-खड़े ध्यान किया जा सकता है। शरीर की अनुकूलता न होने पर घंटों-घंटों बैठकर अथवा खड़े होकर स्वाध्याय या ध्यान करना संभव नहीं हो पाता। शरीर अनुकूल हो तो लंबे विहार भी हो सकते हैं, अवस्था अनुकूल न हो तो लंबा विहार करना भी मुश्किल हो जाता है।
आचार्य श्री तुलसी कोलकाता पधारे और वहाँ से चातुर्मास सम्पन्न कर एक ही शेषकाल में राजनगर, केलवा पधार गए। एक शेषकाल में उनकी संभवतः यह सबसे लंबी यात्रा रही। सेवा करनी है तो भी शरीर की अनुकूलता होनी चाहिए। गोचरी करना, व्याख्यान देना, लोगों को आध्यात्मिक सेवा देना—इन सबके लिए शरीर का आनुकूल्य आवश्यक होता है। शरीर संपदा का उपयोग अच्छे कार्यों में भी किया जा सकता है और बुरे कार्यों में भी, अथवा यह भी हो सकता है कि कोई इसका उपयोग ही न करे।
शरीर संपदा किसे मानें—यह देखने के चार कोण हो सकते हैं। पहला है सौंदर्य। शरीर संपदा का दूसरा कोण है शारीरिक स्वस्थता—निरामयता। तीसरा है शरीर की बलवत्ता, चौथा है इंद्रिय सक्षमता। शरीर की सुंदरता भी आवश्यक होती है, यद्यपि शरीर की सुंदरता का इतना अधिक महत्त्व नहीं है। शरीर की सुंदरता में शुभ नाम कर्म का उदय योगभूत बनता है। सुंदरता की तुलना में शरीर की स्वस्थता, शरीर की बलवत्ता और इंद्रिय सक्षमता का बहुत अधिक महत्त्व है। आचार्यों की आठ गणि संपदाओं में एक शरीर संपदा भी होती है। आचार्य की सुंदरता का थोड़ा मूल्य हो सकता है, परंतु सुंदरता से अधिक शरीर की निरामयता का बहुत अधिक महत्त्व है। शरीर की निरामयता रहेगी तो आचार्य के कार्य करने में अनुकूलता रह सकेगी।
आज का विषय है—“आचार्य भिक्षु की शरीर संपदा।” उनका शरीर सुंदर, निरामय तथा इंद्रिय सक्षमता से युक्त था। उनके शरीर में शक्ति भी रही और शरीर निरामय भी रहा। शरीर को अनुकूल बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। खानपान, ध्यान, प्राणायाम, व्यायाम आदि पर ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए। आचार्य भिक्षु ने अपनी शरीर संपदा का कितना उपयोग किया होगा—आज उनकी जन्मस्थली में उनके शरीर की सक्षमता की चर्चा हो रही है। स्वामी जी का हम स्मरण कर रहे हैं। इतने ज्ञानी और शरीर से सक्षम, हमारे धर्मसंघ के जनक आचार्य श्री भिक्षु को श्रद्धा से नमन करते हैं।
आचार्य श्री की अनुज्ञा से साध्वी सिद्धान्तश्री जी, साध्वी दर्शितप्रभा जी, समणी कुसुमप्रज्ञा जी आदि साध्वियों व समणियों ने संत वृंद से खमतखामणा की। संतों की ओर से मुनि राजकुमार जी ने आने वाली साध्वियों व समणियों से खमतखामणा की। साध्वी सिद्धान्तश्री जी आदि साध्वियों ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्य श्री ने साध्वियों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। सिद्धि मरलेचा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। अहमदाबाद के तेरापंथ किशोर मंडल ने आचार्य भिक्षु पर आधारित प्रस्तुति दी। आचार्य श्री ने किशोरों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। प्रीति डागा ने गीत का संगान किया। प्रेरणा गादिया ने अपनी अभिव्यक्ति दी। प्रमोद भंसाली ने अपनी प्रस्तुति दी। पाली एवं आसींद ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अलग-अलग प्रस्तुतियाँ दीं। पाली के डॉ. भीमराज भाटी ने आचार्य प्रवर के दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। तेरापंथ महिला मंडल, कंटालिया ने पूज्य प्रवर के चरणों में तेरह संकल्पों का उपहार प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमार जी ने किया।