गुरुवाणी/ केन्द्र
बुद्धि और बाहुश्रुत्य के साथ प्रतिपादन की कला का है महत्व : आचार्यश्री महाश्रमण
तीर्थंकर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में आद्य अनुशास्ता आचार्य श्री भिक्षु के जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में ‘भिक्षु चेतना वर्ष’ के महाचरण के नवम दिवस के कार्यक्रम का शुभारंभ मंगल महांत्रोच्चार से हुआ। साध्वी वैभवप्रभा जी ने गीत का संगान किया। निर्धारित विषय “आचार्य भिक्षु की ज्ञान संपदा” पर साध्वी श्रुतयशा जी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। तदुपरान्त पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण जी ने अपनी अमृत देशना प्रदान करते हुए कहा कि मोक्षमार्ग चार अंगों वाला है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए धर्म की साधना आवश्यक है। मोक्षमार्ग के अंगों में एक अंग ज्ञान है। धर्म की साधना में ज्ञान भी सहयोगी बनता है। सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, सम्यक् चारित्र और तप होने पर मोक्ष प्राप्ति की दिशा में गति हो सकती है।
मोक्ष मार्ग के अंग ज्ञान की आराधना स्वाध्याय के माध्यम से हो सकती है। ज्ञानाराधना से मार्गदर्शन की प्राप्ति होती है और कर्म निर्जरा भी हो सकती है। व्यक्ति का श्रुतधर होना एक विशेष बात होती है। ज्ञान के संदर्भ में तीन बातें हैं— बुद्धि, ज्ञान और प्रस्तुति की कला। इनमें प्रथम स्थान बुद्धि का है, उसके बाद ज्ञान का, और यदि ज्ञान भी अधिक न हो तो प्रतिपादन की कला का महत्व होता है। ज्ञान के विकास के लिए प्रतिभा, प्रज्ञा और बुद्धि आवश्यक हैं। इनके अभाव में अधिक परिश्रम करने पर भी ज्ञान का विकास अधिक नहीं होता। यदि व्यक्ति की बुद्धि तीक्ष्ण हो तो वह अज्ञान को दूर कर बाहुश्रुत्य को प्राप्त करने में सहायक बन सकती है। इसके साथ प्रतिभा और बुद्धि का सम्यक उपयोग अर्थात् पुरुषार्थ भी आवश्यक है, तभी ज्ञान का विकास संभव हो पाता है। बुद्धि और ज्ञान के पश्चात् प्रतिपादन की योग्यता व कला— ये तीनों जहाँ होती हैं, वहाँ व्यक्ति अत्यंत योग्य बन सकता है।
परम वंदनीय, परम श्रद्धेय आचार्य श्री भिक्षु को देखकर प्रतीत होता है कि उनमें बुद्धि, बाहुश्रुत्य और प्रतिपादन की कला— ये तीनों गुण विद्यमान थे। आचार्य भिक्षु की ज्ञान संपदा विलक्षण थी। उनका बाहुश्रुत्य अत्यंत विशाल था। ‘भिक्षु दृष्टान्त’ ग्रंथ को देखें तो उनकी प्रतिपादन कला स्पष्ट दिखाई देती है। आचार्य भिक्षु में दूसरों को समझाने और बताने की अद्भुत कला थी। उन्होंने आगमों का कितना गहन अध्ययन किया होगा। आचार्य श्री भिक्षु की ज्ञान संपदा अत्यंत उत्कृष्ट थी। उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण अंग उनकी ज्ञान संपदा है। उनके द्वारा रचित अनेक ग्रंथ भी उनकी ज्ञान संपदा के परिचायक हैं।
इन दिनों गुरुदर्शन करने वाली साध्वियों ने आचार्य प्रवर की आज्ञा से उपस्थित संत समाज को सविधि वंदन कर खमत खामणा की। मुनि दिनेश कुमार जी ने संत समाज की ओर से खमत खामणा की। अभिनव सेठिया ने आचार्यश्री से तेरह की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। कंटलिया की बेटियों ने गीत का संगान किया। आचार्य प्रवर की पावन सन्निधि में एस. हायर सेकेंडरी स्कूल, हरियामाली के विद्यार्थी भी उपस्थित थे। विद्यालय के निदेशक गजेन्द्र सिंह ने अपनी अभिव्यक्ति दी। छात्रा निकिता बंजारा ने अपनी प्रस्तुति दी। आचार्यश्री ने बच्चों की जिज्ञासाओं का समाधान किया और उन्हें मंगल प्रेरणा प्रदान की। आचार्य प्रवर के आह्वान पर उपस्थित विद्यार्थियों ने सद्भावना, नैतिकता एवं नशा-मुक्ति का संकल्प स्वीकार किया। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमार जी ने किया।