स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
जन्म और मृत्यु इस जगत् की सामान्य एवं शाश्वत घटनाएं हैं। ये अपने आप में न तो महत्त्वपूर्ण होती हैं और न ही लघुत्वपूर्ण। किन्तु इन दोनों के बीच जो अन्तराल होता है, जिसे जीवन कहते हैं, वह महान् या लघु होता है। इसकी महत्ता और लघुता जन्म व, और मृत्यु को भी प्रभावित करती है।
महान् वह होता है जो अपना भावात्मक दायरा विस्तृत कर लेता है और लघु वह होता जो उसे संकुचित कर लेता है। एक स्वार्थी व्यक्ति महान् नहीं होता, क्योंकि उसका चिंतन संकीर्ण होता है। उसकी सोच तुच्छ स्वार्थ-पूर्ति पर केन्द्रित रहता है।
भारतीय संस्कृति ने 'वसुधैव कुटुम्बकम्' और 'तुमंसि नाम सच्चेव जं हंतव्वं ति मन्नसि' आदि सूत्रों के माध्यम से स्वार्थ-चेतना के उदात्तीकरण का पाठ सिखाया है। महानता की प्रमुख कसौटी है-परार्थ और परमार्थ की चेतना का जागरण।
महानता के महान् साधक युगप्रधान गुरुदेवश्री तुलसी बहु-आयामी व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व के धनी हैं। इनकी तुलना अनेक महापुरुषों के साथ की जा सकती है। गुरुदेवश्री के चिंतन, कार्य एवं जीवन-घटनाओं के कुछ ऐसे पहलु हैं जिनमें श्रीमज्जयाचार्य का प्रतिबिम्ब देखा जा सकता है।
आगम-मंथन
प्रज्ञापुरुष जयाचार्य के मन में जैन आगमों को जनभोग्य बनाने की प्रेरणा जागी। उन्होंने उत्तराध्ययन की जोड़, आचारांग की जोड़, आचारांग रो टब्बो, ज्ञाता री जोड़, निशीथ री जोड़, अनुयोगद्वार री जोड़, पण्णवणा री जोड़ आदि आगम-व्याख्या ग्रंथ तथा 'झीणी चर्चा', 'प्रश्नोत्तर तत्त्वबोध' आदि अनेकानेक तत्त्व-दर्शन संबंधी ग्रंथों का प्रणयन कर जैन आगमों को राजस्थानी भाषाविद् लोगों के लिए सुबोध बनाया!
गुरुदेवश्री तुलसी के मानस-पट पर भी एक ऐसा ही चित्र उभरा। वि. सं. २०१२ से गुरुदेवश्री के नेतृत्व में जैन आगमसम्पादन का कार्य चल रहा है, जिसके अन्तर्गत पाठान्तर व शब्दसूची सहित आगम-बत्तीसी का सम्पादन हो चुका है। दसवेआलियं, उत्तरज्झयणाणि, सूयगडो, ठाणं, अणुओगदाराइं, भगवई विआह पण्णत्ती (प्रथम् खण्ड) एवं समवाओ का मूल पाठ, संस्कृत छाया व समीक्षापूर्ण व्याख्यात्मक टिप्पणी सहित हिन्दी अनुवाद भी प्रकाशित हो चुके हैं। श्रमण प्रतिक्रमण भी इसी रूप में प्रकाशित है। दसवेआलियं एवं उत्तरज्झयणाणि का हिन्दी पद्यानुवाद, हिन्दी गद्यानुवाद, आयारो का मूलपाठ एवं समीक्षा पूर्ण व्याख्यात्मक टिप्पणों सहित हिन्दी अनुवाद भी प्रकाशित है। 'दशवैकालिकः एक समीक्षात्मक अध्ययन' तथा 'उत्तराध्ययनः एक समीक्षात्मक अध्ययन' भी मुद्रित हैं। एकार्थक कोश, निरुक्त कोश, एवं देशी शब्दकोश तथा दशवैकालिक वर्गीकृत (धर्म प्रज्ञप्ति ख. १) एवं उत्तराध्ययन वर्गीकृत (धर्म प्रज्ञप्ति खः २) भी इसी श्रृंखला की कड़ियां हैं। जयाचार्य द्वारा प्रणीत 'भगवती की जोड़' प्रायः पूर्णतया मूल पाठ सहित प्रकाशित है। इनके अतिरिक्त और भी कुछ आगम-साहित्य प्रकाशित हुआ है।
व्यवस्था में नवीनीकरण
श्रीमज्जयाचार्य से पहले तेरापंथ में व्यवस्था का पक्ष सुदृढ़ नहीं था। उन्होंने साधु-संघ में कई नई व्यवस्थाएं लागू-कीं, जैसे-
पुस्तकों का संघीकरण
व्यक्तिगत शिष्य बनाने की परम्परा को तो आचार्य भिक्षु ने ही समाप्त कर दिया था, पर व्यक्तिगत पुस्तकें रखने की परम्परा जयाचार्य के समय तक चालू थी। किसी वर्ग में ढेर सारी पुस्तकें थीं तो किसी वर्ग में बहुत कम। जयाचार्य ने अपनी सूझ-बूझ से उस परंपरा को मिटाया और पुस्तकों का केन्द्रीकरण किया। उसके पश्चात् अपेक्षा के अनुसार सब साधु-साध्वियों में उनका वितरण कर दिया गया।
श्रम का संविभाग
स्वामी भीखणजी के समय साधुओं के कार्य की कोई निश्चित व्यवस्था नहीं थी। जिस कार्य पर जिसका ध्यान चला जाता, वही उसे कर लेता। कुछ कार्य ऐसे थे जिनको दीक्षा में सबसे छोटा साधु कर लेता। उस समय यह क्रम चल सकने वाला था, क्योंकि साधुओं को संख्या थोड़ी थी, किन्तु जयाचार्य के समय साधुओं की संख्या बढ़ चुकी थी। इसे देखते हुए उन्होंने यह व्यवस्था बना दी कि सामूहिक कार्य बारी-बारी से सभी को करने होंगे।