संबोधि

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

संबोधि

उपवास शब्द की ध्वनि भी यही है कि चेतना के निकट निवास करना। चेतना वहीं आकृष्ट हो जाती है जहां दर्द, पीड़ा या कष्ट है। सिर में दर्द है तो ध्यान सिर पर चला जाता है। पैर में कांटा लगा तो ध्यान उस जगह आ जाता है। यह सबका स्पष्ट अनुभव है। भूख भी पीड़ा है। बुभुक्षित व्यक्ति का ध्यान पेट के आस-पास घूमने लगता है। उसे स्वप्न में भी भोजन का दर्शन होता है।
एक व्यक्ति अपने परिवार के साथ गांव आ रहा था, मार्ग में निर्जला एकादशी का महान् पर्व आ गया। मन्दिर में कथा सुनने लगा। पंडितजी ने कहा-आज के व्रत का महापुण्य होता है। यह सुन उसने व्रत रख लिया और अपने साथ वाले कुत्ते और बिल्ली को भी व्रत करा दिया। रात को सोये। सब उठे। बिल्ली ने कुत्ते से कहा-'रात को बड़ा अद्भुत स्वप्न आया।' पूछा- 'क्या ?' बिल्ली ने कहा- 'आकाश बादलों से छाया हुआ था और चूहों की बरसात हो रही थी।' कुत्ते ने कहा- 'पगली ! ऐसा कभी होता है? स्वप्न तो मुझे भी आया था। मैंने हड्डियों की बरसात देखी।' मालिक सब सुनकर हंस रहा था। उसने कहा- 'तुम दोनों ही नासमझ हो। न आकाश से चूहे बरसते हैं और न हड्डियां। स्वप्न मेरा सच था। मैंने देखा आकाश में भोजन की बरसात हो रही थी।
बरसात तो थी नहीं, भूखे व्यक्तियों का सपना था। चेतना वहीं मंडरा रही थी।
बुद्ध के जीवन का एक प्रसंग है। वे एक नगर में आये। एक निर्धन किसान की इच्छा हुई कि आज कुछ सुनना है। किन्तु सुबह-सुबह एक बैल घर से निकल गया। बेचारे को खोजने जाना पड़ा। दोपहर में बैल मिला। दिन भर का थका-मांदा भूखा-प्यासा था। उसके कुछ सुनने की तीव्र प्यास थी। घर नहीं आया। सीधा बुद्ध के समीप पहुंचा। दर्शन किये और कहा- 'कृपया, कुछ मुझे भी उपदेश दें। बुद्ध ने देखा-प्यासा है आदमी, भूखा भी है। बुद्ध ने भिक्षुओं से कहा-इसे पहले भोजन दो।' भोजन कराया और उपदेश दिया। वह निर्धन किसान श्रोतापत्ति को उपलब्ध हो गया, धर्म के मार्ग-बुद्ध के मार्ग को प्राप्त हो गया। धर्म के स्रोत में गिर गया। बुद्ध जानते थे-भूख रोग है। अभी उपदेश सार्थक नहीं होगा। चेतना सुनती नहीं है। चेतना के सुनने का आयाम है-स्वस्थता।
महावीर ने अनशन का उपयोग किया और कहा-भोजन को छोड़कर चेतना को जागृत रखने का प्रयोग भी साधक को करना चाहिए और उनमें होने वाले अनुभवों से भी अपने को प्रशिक्षित करना चाहिए। साधक को यह देखते रहना चाहिए कि भूख कहां है? किसे है? मैं कौन हूं? शरीर के साथ जो तादात्म्य है उसे तोड़ते रहना चाहिए। मैं शरीर नहीं हूं, चेतन हूं। चेतना पेट के पास दौड़े तब उसे सावधान करे कि-'आज भोजन करना ही नहीं है, तब कैसा चिंतन ? आत्म-जागरण में अपने का व्यस्त रखने का प्रयास करना तथा सूक्ष्म शरीर को प्रकाशित कर चेतना की सन्निधि में पहुंचना ही उपवास का कार्य है।